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बयान वाइरल हुआ

विदेश मंत्री यस जयशंकर का एक बयान इधर सम्पूर्ण विश्व में वाइरल हुआ है जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका के प्रभाव का वह युग समाप्त हो गया है जब उसे चुनौती देने की औकात किसी में नहीं थी। शीत युद्ध के बाद से विश्व में शक्ति बहुध्रुवीय होना प्रारम्भ हो गई थी। राष्ट्रपति ओबामा के समय से यूनाइटेड स्टेट्स ने अपनी विदेश नीति बदली है और दुनिया के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से हाथ खींचे हैं, उदाहरण के तौर पर राष्ट्रपति बाइडेन ने अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी की। अब विश्व उस ओर लगातार बढ़ रहा है जहां किसी भी एक देश का एकाधिकार नहीं चल सकता और यह भारत के उदय का समय है। फिर उन्होंने जोर देकर कहा है कि भारत का उदय उसकी अपनी क्षमताओं पर निर्भर होगा, न कि दूसरों से प्रेरित होगा। इस बदलते वैश्विक क्रम में भारत ने संतुलित दृष्टिकोण पर बल दिया है।

ऑपरेशन संकल्प

भारत की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जीत तब हुई जब ईरान ने भारत के लिए सुरक्षित मार्ग देने की बात कही है। इस बीच भारत ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए "ऑपरेशन संकल्प" के तहत युद्धपोत और टास्क फोर्स तैनात किए हैं। ये युद्धपोत एलपीजी 'शिवालिक' और 'नंदा देवी' टैंकरों को सुरक्षित मार्ग प्रदान करने के बाद होर्मुज के पश्चिम में फंसे 22 भारतीय जहाजों की सुरक्षा के लिए मुस्तैद हैं। इसके अतिरिक्त वे अपने चाबहार बंदरगाह की भी निगरानी कर रहे हैं। यह तैनाती खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की आपात स्थिति से निपटने और भारतीय ध्वज वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए की गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य

शायद अमेरिका ने सोचा होगा कि ईरान स्वयं अपने दुश्मनों को आमत्रित कर लेगा क्योंकि वह उसके मिडिल ईस्ट देशों में स्थित मिलिट्री वेस पर जैसे हमला करेगा वे सारे देश युद्ध में शामिल होने लगेंगे। इसके अतिरिक्त होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के हर देशों के जहाज गुजरते हैं। ईरान इस रास्ते को बंद करेगा जरूर तो भारत सहित सारे यूरोपीय देश अपने-अपने जहाज़ों को निकालने के लिए बल प्रयोग करने लगेंगे। हो सकता है अमेरिका का यह कैलकुलेशन फेल हो गया क्योंकि सभी देशों ने किनारा कर लिया। चीन और भारत ने ईरान से तेल खरीद की डील कर ली और अपने जहाज मजे से निकाल रहे हैं। अब अमेरिका की गति सांप छछूंदर की हो गई है।

एक दो लोग शराब पीते थे, आज एक दो लोग नहीं पीते है

दस पंद्रह वर्ष पहले गावों में एक दो लोग शराब पीते थे, आज एक दो लोग नहीं पीते है। मांस खाने की स्थति तो यह हो गई है कि आदमी गिद्ध हो गया है। देश नशे की लत में है। वहीँ हमारी सरकार जी को वोट का एडिक्शन है। उन्हें जब वोट की तलब आती है तब चाहे जिस कीमत में मिले उन्हें वोट चाहिए ही चाहिए। चाहे हिन्दू समाज टूट जाय, चाहे देश में एक और बंगलादेश देश बन जाय, कुछ हो जाय बस वोट चाहिए। वे वोट के लिए सारे देश को अपढ़ निरक्षर बना सकते हैं। वोट के कारण उन्हें यदि सबसे अधिक दुश्मनीं है तो ब्राह्मणों से है। जबकि जब वे वोट के लिए तड़पने लगते हैं तब ब्राह्मण ही उसकी व्यवस्था करते हैं चाहे अपना रक्त ही क्यों न पिलाना पड़ जाय। ब्रह्मण भारतीय शिक्षा का आधार है - उस पर हमला देश के शिक्षा तंत्र पर हमला है। ब्राह्मण अध्यापक से पढ़ेंगे तभी आरक्षण के लाभ मिलेंगे। फिर भी आज ब्राह्मण को पिछड़ा नफ़रत करता है, उससे ज्यादा दलित नफ़रत करता है, ब्राह्मण, क्षत्रिय में कुछ ऐसे भी वर्ग हैं जो अंदर ही अंदर प्रतिस्पर्धी हैं। पैसे वाला वैश्य नौकरी में ब्राह्मण लड़की/लड़कों को रखना पसंद करता है क्योंकि अधिकतर वे धोखेवाज नहीं होते ह...

राक्षस VS ब्राह्मण

मानवता में केवल दो वर्ग हैं। दारू पीकर बलबलाने वाले, खैरात पर बिकने वाले, व्यभिचारी, भक्षाभक्ष्य, ब्र्ह्मद्रोही, नारायणद्रोही, पतित आदि सभी राक्षस हैं। इसके विपरीत वे सभी ब्राह्मण हैं जो सदाचारी हैं, ज्ञानी हैं, धर्मनिष्ठ हैं। ब्राह्मण वे भी हैं जो हरि या हर के समर्पित भक्त हैं। त्रिलोकी नाथ राम जी को गरीब नवाज कहा जाता है। उनके गरीब दुश्चरित्र नहीं थे। यूजीसी ब्राह्मण दमन का क़ानून है, रावण संहिता है, अधर्म है। इस सरकार के अच्छे दिनों का भण्डार समाप्त होने वाला है इसलिए उसका मतिभ्रम हुआ है और उसने ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा नष्ट करने का निर्णय किया है। ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ही वासुदेव की प्रतिष्ठा है और उसे कलंकित करने का अर्थ है विश्व में विनाश। ब्राह्मण ने तप करके ब्रह्माण्ड में महादेव के दर्शन किये हैं। वह माता भवानी का प्रतिनिधि है इसलिए किसी भी तूफ़ान में वह पथभ्रष्ट नहीं हुआ है। मोदी जी अभी भी समय है, धर्म का साथ दो - धृतराष्ट्र मत बनों, नहीं तो पाण्डव केवल पांच नहीं हैं, उनके साथ सुदर्शनधारी भी हैं। सब कुछ नष्ट होगा।

जनता को चिंता हो करता नेता वही

जनता की चिन्ता नेता की चिन्ता नहीं। जनता को चिंता हो करता नेता वही। बंगलादेश में हिन्दुओं की सामूहिक ह्त्या हुई। जनता डरी और इंतज़ार करने लगी। कब भारत की सेना जाएगी, बंगलादेश में तबाही मचाएगी। सेना तो गई नहीं, तेल जाने लगा सहायता जाने लगी। भाषण हुआ रोहिंगिया की बाढ़ आ गयी। जनता चीखी रोहिंग्या भीड़ हमारी रोजी-रोटी खा गई। उनके आधार चुपके से बनने लगे, हम भारत के नागरिक हैं वे कहने लगे। गरजा हिन्दू का ठेकेदार अब तो होगा आरपार। आतंक मिटेगा दुनिया से, हिन्दू राष्ट्र बनेगा भारत ये। अचानक मोहब्बत की हूक हुई, मदरसों की डिग्री वैलिड हो गई। सदियों से दलितों पर अत्याचार का किया गया परचार। छिपकर इसके पीछे बैठ, बनाया एससी/एसटी एक्ट। आकाशवाणी हुई "यदि बंटोगे तो कटोगे"। पीछे से आई यूजीसी बोली, “देखते हैं मिलजुल कर तुम कैसे रहोगे !“ मुसलामान होता कभी नहीं देश के साथ, वे बोलते रहे और करते रहे सबका साथ उनका विकास। जहां जहां है भारी भीड़, वहीँ परोसें मोदी खीर। प्रतिभा बैठे जहां-जहां, वे धूल उड़ाएं वहां-वहां। हिन्दू हिन्दू मात्र दिखावा, राष्ट्रवाद पाखण्ड। वोट देवता जहां जहां, वहीँ आदि अव अन्त।

कानून अन्याय बन जाता है

  चूंकि मोदी कानून का उद्देश्य वोट होता है न कि सामाजिक न्याय इसलिए जब वह मीठे जहर की तरह फैलता है तब अन्याय बन जाता है। महिला सशक्तिकरण पर हर महिला यही कहेगी कि पुरुषों ने महिलाओं पर शादियों से अत्याचार किये हैं। ये भ्रम है जिसका लाभ मोदी सरकार उठाती है और महिला सुरक्षा का एकतरफा कानून बनाकर महिला वोटबैंक तैयार करती है। वास्तव में, इस कानून से जब असामाजिक महलाएं निर्दोष पुरुषों को ब्लैमेल करती हैं तो सरकार आँख बंद कर लेती है। अब यदि महिला से पूछा जाय कि आप किसी पुरुष की बेटी हैं, किसी की बहन हैं, किसी की पत्नी हैं, किसी की मां हैं - क्या इन पुरुषों को आपके सुरक्षा की चिंता नहीं है और यदि है तो क्या वे पुरुष नहीं हैं? वे भूल गयीं कि इस कानून का शिकार यदि उनका भाई या बाप होता है तो उन्हें कितनी पीड़ा होगी। महिला पुरुष एक दूसरे की पूरक हैं उनमें वैमनस्य पैदा करना अपराध है। महिला सुरक्षा का योगी कानून तुरंत अपराध रोकता है - महिला पुरुष में भेद नहीं करता। इसी तरह यूजीसी के नए नियम ओबीसी, एससी और सामान्य वर्ग में न्याय नहीं करते बल्कि जहर घोलते हैं और मोदी पार्टी के लिए वोट बैंक तैयार कर...

हिन्दुराष्ट्र बनाने का सपना

  आपने कहा कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। चलो हम आपकी बात मान लेते हैं किन्तु यूजीसी के परमाणु बम की धमकी तो आपने दिया ही है। यह वह बम है कि यदि फटा तो केवल सामान्य वर्ग को ही नहीं अपितु सारे समाज को अस्त-व्यस्त कर देगा। इसका आभास उन अज्ञानियों को नहीं है जो इसे लागू कराने के लिए उतावले हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि हिन्दू समाज में भेदभाव का अर्थ है दूसरे बहुसंख्यक समाज को पुनः सत्ता तक पहुंचने में रास्ता साफ़ करना। यदि आप अंधभक्तों के न हो सके तो आप दलित, पिछड़ों के भी कैसे हो सकते हैं? हम सारे हिन्दू समाज अगड़े-पिछड़े सभी ने उम्मीद की थी कि आप अवैध्य नागरिकों को देश से निकाल देंगे। हम सभी उम्मीद किये थे कि आप सामान नागरिक संहिता लाएंगे। हम आशावान थे कि धर्म के आधार पर एक बार बटवारा हो चुका है अतः आप देश को हिन्दुराष्ट्र बनाने का हमारा सपना सच करेंगे। हम सभी ने सोचा था कि आप क्रीमी-लेयर को सामान्य में शामिल करते रहेंगे ताकि आरक्षण के होते हुए भी आरक्षित और अनारक्षित वर्ग से भेदभाव मिटता रहे और हिन्दू समाज संगठित होकर सशक्त हो जाय। हमने सोचा था कि जिन्होंने धर्म परिवर्तित कर लिया है ...

उस जनता की रीढ़ तोड़ने लगे जो देश की रीढ़

  वोट-प्रेम और राष्ट्र-प्रेम दो अलग-अलग चीजें हैं। राष्ट्र को नुकसान किये वगैर यदि सत्ता प्राप्त किया जाय तो सकारात्मक राजनीति कहते हैं किन्तु राष्ट्र को कमजोर करके सत्ता हथियाने को नकारात्मक राजनीति कहते हैं। खैरात बांटना देश को दोहरा नुकसान पहुंचाता है : खाने वाले को निकम्मा करता है तथा टैक्स से कर्मयोगी जनता को हतोत्साहित करके उसका विकास रोकता है। चीन में हर घर में उद्योग है यहां हर घर में ठर्रा है और मुफ्त का अनाज है। हर देश में सभी नागरिकों के अधिकार सामान हैं और मुफ्त की योजनाएं केवल गरीब, असहाय लोगों के लिए हैं। यहां विशिष्ट वर्गों के अफसरों, नेताओं और अमीरजादों के लिए कानूनी सुरक्षा है और आरक्षण की भीख है। यदि यही उनके गरीबों को मिल जाय तो उनका कल्याण हो जाय। साथ ही लाभ प्राप्त लोगों का सामान्य में जुड़ने से सामाजिक बैमनस्य भी दूर हो जाय। इतनी नकारात्मक राजनीति से मोदी सरकार का जी नहीं भरा तो उसे देश की प्रतिभाओं का दमन सूझ गया और यूजीसी लेकर आ गयी। स्वयं राजा जब हीन भावना का शिकार हो जाय तो देश का विघटन कौन रोक सकता है। मैं पिछड़ा चाय वाला दीनहीन कहते-कहते सामान्य वर्ग से स्...

राष्ट्र सर्वोपरि है

  हम सवर्णों को उन दलित और पिछड़े भाइयों के प्रति पूरी श्रद्धा और सहानुभूति है जो अत्यंत गरीब और तिरस्कृत हैं और जो अलगाववाद का समर्थन नहीं करते बल्कि भारतीय संस्कृति में पूरी निष्ठां रखते हैं। हम चाहते हैं कि आरक्षण का लाभ यदि इन लोगों तक पहुंचाया जाय तो आरक्षण जारी रहना चाहिए और यदि इससे देशद्रोही, विधर्मी, बिलासी वामपंथियों को पोषित होना जारी रखना है तो आरक्षण समाप्त होना चाहिए। "धर्म पाखंड है, मनुवाद मुरादाबाद, राम काल्पनिक हैं, राम चरित मानस को बैन कर दो, वन्दे मातरम साम्प्रदायिकता है" आदि राष्ट्र और सनातन आस्था से द्रोह की अभ्व्यक्ति न तो दलित करता है, न पिछड़ा और न ही सामान्य बल्कि तीनों में से हिन्दू के वेश में देश को धोखा देने वाले ठग करते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें यह भय है कि कहीं ऐसा न हो जाय कि इनसे लगातार आरक्षण की लग्जरी छिन जाय और लाभ गरीब दलितों व् पिछड़ों को मिलने लगे। अथवा ये लोग उस पार्टी के समर्थक हैं जो किसी वर्ग को नहीं बल्कि कुछ अपनी जातियों के लोगों को सरकारी नौकरियाँ परोस देती हैं। ये खानदानी वेतन भोगी देश पर भार हैं - इन्हें किसी भी लाभ से तुरंत वंचित...

जाति आधारित कानून

जाति नाम का एक भूत होता है वह अक्सर लोगों को पकड़ लेता है फिर छोड़ता नहीं। जिसको वह पकड़ता है उसे दिखता है कि एक जाति के सारे लोग एक जैसे होते हैं - वे या तो सभी अच्छे होते हैं या तो सभी बुरे। क्या यह सही है कि एक जाति के सारे लोग आमिर होते और दूसरे के सभी गरीब? दलित जाति का एक थानाध्यक्ष है, यदि वह एफआईआर लिखाये कि कड़ी धूप में फसल काटने वाले एक ब्राह्मण ने उस पर अत्याचार कर दिया है तो क्या न्याय होगा ? किन्तु क़ानून इसकी इजाजत देता है। आखिर सरकारें क्या सोचकर जाति आधारित कानून बनाती हैं? जोकर अजीब देखो, ज्ञानियों की खीस देखो नंगन की नाच देखो, गीत सुनो गूंगन के । ऐसे हास्य दृश्य के अनेक आइटम देखो चित्र हैं विचित्र औ चरित्र राजनीति के । कोई इतना बढ़िया ज्ञान नहीं दे सकता जितना सरकार ने दिया : "बंटोगे तो कटोगे।" दूसरी तरफ सरकार ही इसारा करती है : "जोर-जोर कहो ये मनुवादी हैं" ... कहो "तिलक, तराजू औ तरवार - इनको चहिए जूते चार।" ...कहो यूरेशिया के हो वहीँ भाग जाओ।" तीसरी तरफ बोलती है : "ले यूजीसी पकड़ और न तो खुद पढ़, न इन्हें पढ़ने दे, साथ ही इनकी शिक्षा ...

सत्ता सुख के लिए राजनीति भवानी को बलि

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मैं स्पष्ट कर रहा हूँ कि मैं साहित्यकार हूँ किसी पार्टी का नहीं हूँ - मैं राष्ट्र का हूँ, सनातन का हूँ। जब कोई पार्टी राष्ट्र और सनातन के उत्थान की नीति पर काम करती है, मैं उसका फैन बन जाता हूँ। किन्तु विरोधी नीति पर मैं चुप भी नहीं रह सकता हूँ। आपको सत्ता सुख मिल सके इसलिए राजनीति भवानी को बलि चाहिए। एकतरफा महिला क़ानून की वजह से बहुत सी महिलाएं इसके दुरपयोग का व्यापार करती हैं। जो पुरुष इनकी चपेट में आ गया है उसकी आत्मा से पूछो। इस कानून का शिकार सम्पूर्ण पुरुष वर्ग है। एकतरफा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम अप्रत्यक्ष बदला लेने का घातक हथियार बना हुआ है। जिसे इसकी हवा लग गयी हो उसकी वर्वाद जिंदगी को देखो। इसका शिकार सामान्य और ओबीसी है। अब एक तीसरा कानून आने वाला है जिसका नाम यूजीसी 2026 है। यह भी एकतरफा सामान्य वर्ग के व्यवसाय और उनके बच्चों के भविष्य को विषाक्त तीर की तरह टारगेट करता है। कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टिया मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर सनातनियों को मुंह पर गाली देते हैं। किन्तु वर्तमान बीजेपी उन्हें वह टेबलेट खिलाती है जो जीभ पर अत्यंत स्वादिष्ट होती है किन्तु आंत में...

जनता का भयभीत होना

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कांग्रेस ने 65 वर्षों तक राज किया। सोंचा गया था कि अब बीजेपी की बारी है यह भी 50 -60 वर्षों तक चलेगी। इसका पतन इतना शीघ्र हो जायेगा इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी? बांटो राज करो यह नीति तब काम करती है जब जनता स्थिर होती है, किन्तु जब भयभीत हो जाती है तब सारा वर्ग एक साथ सरकार से भड़क जाता है और दूसरी कोई बात नहीं सुनता। इंदिरा गाँधी की हार का कारण इमरजेंसी थी। अखिलेश सरकार के पतन का कारण जनता का भयभीत होना था वरना उसने काम बहुत अच्छा किया था। मोदी जी को जनता ने सुरक्षा छत्र के रूप में देखा और उन पर अंधा विशवास कर लिया था। योगी जी की लोकप्रियता का कारण भी उनसे सुरक्षा की उम्मीद रही है। भगवान् राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक राज किया था क्योंकि उनके हनुमान ने "बाएं भुजा असुर संहारे, दाहिने भुजा संत जन तारे"। बीजेपी सरकारों ने कानूनों के माध्यम से अथवा स्वभावगत प्रतिशोध के माध्यम से अपनी समर्थक जनता को भयभीत कर दिया है। ठीक यही कार्य एक बार मुलायम सरकार में हुआ था तो सवर्ण भूल गए थे कि मायावती ने उन्हें कितनी गाली दी थी। बात राम राज की करोगे किन्तु अत्याचार प्रहलाद पर करोगे। तुन्हे...

Happy Holi

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  "Festivals with Poetic Greetings" by Ramesh Chandra Tiwari is a curated collection of Indian religious, national, and international festivals arranged chronologically. Each entry features concise, informative descriptions alongside heartfelt verse wishes, designed for personal greetings, social media, and professional, relationship-based marketing. When winter ends and spring harvest arrives, the youth blossom and fragrance of love spread everywhere. Now the Holi season takes everyone into ecstasies. On the full moon day of the month of Phalguna, people, so full of fire, celebrate the popular festival of colour and love. It often falls in March, but sometimes in late February. Holi commemorates the victory of Bhagwan Vishnu over Hiranyakashipu. The gatekeepers of Bhagwan Vishnu, Jaya and Vijaya, annoyed Sanak, Sanandan, Sanat Kumar, and as a result, the Kumar’s cursed them, saying they be demons. In Satyuga, they were born to sage Kashyapa and Diti as Hiranyakashipu and Hir...

समय लग सकता है पर क्या रावण बच सकता है

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  जब सत्ताधारियों का ह्रदय भी जातिवाद का भवन बन जाय तो जनता के ह्रदय से राष्ट्रवाद पलायन करने लगता है। सत्ता की उष्मा बहुत मादक होती है - लम्बे समय तक कम ही लोग होश में रह पाते हैं। अधिकतर प्रतिशोध-राजनीति से सीना ठंढा करने लगते हैं। वे रोगाणुओं को मारते-मारते अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट करने पर उतर आते हैं। अंततः ऐसे मतवाले हाथी दलदल में फंसकर असहाय हो जाते हैं। सत्ता का अहम् आर्थिक पतन, जनक्रांति, तख्तापलट, विदेशी हस्तक्षेप को जन्म देता है। मुसोलिनी, अडॉल्फ हिटलर, सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी, मादुरो इसके कुछ उदहारण हैं। पकिस्तान में राजनितिक अस्थिरता का कारण प्रतिशोध राजनीति है। स्थाई और संतुलित राजनीति धैर्य मांगती है, होश मांगती है, अकड़ नहीं लोच मांगती है। जातिवाद से जले बिहार में जहां-तहाँ राख है। यूपी इत्यादि को भी होना क्या ख़ाक है? सत्ता को चाहिए वह एन्टीबायटिक औषधि का काम करे, साइड इफेक्ट न बने। वणिक की तरह वही कौड़ी खर्च करे जो नयी कौड़ियां ला सकती हैं न कि हर कौड़ी को तितर-बितर कर दे। गाय और ब्राह्मण हिंसक नहीं होते, उनसे हिंसा त्रिभुवन स्वामी राजा राम को चुनौती है। समय...

भावनाओं का भाँग

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  राम मंदिर निर्माण, धारा 370 निरस्त, भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान, संशाधनों का अभूतपूर्व विस्तार, आर्थिक और औद्योगिक विकास, ईडब्लूएस कानून, वक्फ कानून में सुधार आदि बहुत सारे सराहनीय कार्य मोदी सरकार ने किये हैं, किन्तु इसमें सवर्ण को क्या मिला? हम राष्ट्रवादी हैं, भारतीय संस्कृति के पोषक हैं इसलिए हमें देश के विकास पर गर्व मिला है। अब यदि अपने सवर्ण वर्ग विशेष की दृष्टि से देखें तो सबसे अधिक हमारा ही नुक्सान हुआ है क्योंकि सबका साथ सबका विकास नहीं बल्कि बड़े को काट छोटे को खैरात हुआ है। साथ ही इसके पीछे अल्पसंख्यक का दोनों धार्मिक और आर्थिक विकास इतना हुआ है जितना आरक्षण से आरक्षित वर्गों को 75 वर्षों में नहीं हो सका। कांग्रेस काल में हमेशा मुस्लिम और दलित का जीवन स्तर सामान रहा है। किन्तु मोदी सरकार के दौरान दलित और ओबीसी वर्ग मुस्लिम रोजगारियों के मजदूर बन गए हैं। मुस्लिम व्यापारियों के उत्थान से सवर्ण व्यापारियों की रीढ़ टूट गई है क्योंकि वे हर तरह से व्यापार नहीं कर सकते। अब यदि बात ब्राह्मणों की करें तो मोदी सरकार में इनकी वही स्थिति हुई है जो स्थिति पकिस्तान में हिन्दुओं की ...

आरक्षित अनारक्षित में विषैला भेदभाव

बीजेपी सरकार ने यूजीसी अधिनियम के माध्यम से आरक्षित और अनारक्षित के बीच में विषैला भेदभाव पैदा कर दिया है जो मिटेगा नहीं। ऐसा अचानक क्यों किया है इसे स्पष्ट रूप से कोई नहीं जानता। कोई कहता है पीडीए कांसेप्ट को निष्प्रभावी करके पिछड़े और दलित को आकर्षित करना है, तो कोई कहता है कि मुख्यमंत्री योगी जी की तेजी से बढती लोकप्रियता को समाप्त करना है। जो भी हो, ऐसी राजनीति देश के लिए अत्यंत अशुभ है। ओबीसी और सामान्य में शून्य भेदभाव था, हिन्दू के नाम पर दोनों को इकठ्ठा करना सरल था और इसी आधार पर बीजेपी का संगठन खड़ा हुआ। मण्डल आयोग ने दोनों को बाँट दिया और तबसे जहां सवर्ण प्रत्यासी होते हैं वहां बड़ी संख्या में ओबीसी वोट कट जाते हैं। किन्तु अब जो हुआ है उसने तो दोनों वर्गों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। परिणाम यह होगा कि जहां ओबीसी प्रत्याशी होगा वहां सवर्ण नोटा ठोंकेगा और जहां सवर्ण प्रत्यासी होगा वहा ओबीसी अपने प्रत्यासी की ओर झुकेगा, वह भले किसी पार्टी का हो। बीजेपी के अमृत काल में काल पैदा हो गया है। आने वाले समय में सवर्ण अपनी अलग राजनीति के विकल्प को तलाशेगा, अपनी बस्तियां मुस्लिम से ...

साहिब से सब होत है

मोदी जी ने बता दिया मैं साहिब हूँ और आप बन्दे: यदि मैं राइ से पर्वत बना सकता हूँ तो एक झटके में पर्वत को राइ भी कर सकता हूँ। लेकिन उन्हें यह भी जानना चाहिए जब बन्दे इकट्ठे हो जाते हैं तो साहिब के साहिब हो जाते हैं। वैसे आपका झोला तैयार हो चुका है, माननीय, क्योंकि अपने गुरु की तरह आपको भी जिन्ना से प्यार हो चुका है। चाहे हिन्दू हिन्दू को बांटो या मुस्लिम राजनीति को पोशो बात एक है। संघ प्रमुख का कहना है "मन में यह भाव नहीं होना चाहिए कि एक को दबाकर दूसरे को खड़ा किया जाना चाहिए। आपस में प्रेम भाव होना चाहिए। समाज को बांटने या बंटने में चिंता होनी चाहिए।" सौ वर्षों से संघ हिन्दुओं को संगठित करने की कोशिश कर रहा है और आपने चुटकी बजाते उन्हें खण्ड-खण्ड कर दिया। सीधा मतलब है कि आपने उस सगठन को दरकिनार किया है जिसने आपको शेर बनाया। यह भी मत भूलो, वह आपको पुनः चूहा भी बना सकता है, उसने ऐसा किया भी है और करने की सोच भी रहा है। आपके मंत्री कहते हैं किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होगी। आपने नाइंसाफी की हद कर दी है तब ये आवाज उठनी शुरू हुई है, कोई अपने पैर में ऐसे ही कुल्हाड़ी नहीं मारता। ...

एआई दिल्ली सम्मलेन

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  एआई दिल्ली सम्मलेन में अमेरिका, चीन और भारत के वैज्ञानिकों में प्रतियोगिता हुई। अमेरिका वाले ने एक रोबोट बनाया जो हू-बहू आदमी की तरह काम करता था। चीन वाले ने उसी रोबोट को लिया और उसे संशोधित करके उसमें मानवीय संवेदना जोड़ दिया। अब बारी थी भारत की, भारतीय वैज्ञानिक बड़ी अकड़ से उठता है और उसी रोबोट को अपने वर्क प्लेटफार्म पर रखता है। दर्शक आश्चर्य में हैं कि अब इसमें नया क्या जोड़ा जा सकता है। किन्तु शीघ्र ही 'मेड इन इंडिया' की मुहर लगाकर गलगोटिया उसे अपने स्टाल पर सजा कर रख देती है। ऐसा भद्द कराया नेहा सिंह ने! उधर भारत मंडपम में ऐसी अफरातफरी होती है कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। स्टानफोर्ड प्रोफ़ेसर सूर्य गांगुली कहते हैं कि अमेरिका में उच्च स्तरीय कंप्यूटर वज्ञानिक अधिकतर भारतीय मूल के हैं। यहां गलगोटिया वाले हैं क्योंकि सारे देश अपनी प्रतिभा को देश की बहुमूल्य संपत्ति मानते हैं, उन पर बड़ी रकम खर्च करते हैं, वहीँ हमारी सरकार को बुद्धिजीवियों से स्वाभाविक चिढ़ है क्योंकि उनकी सपत्ति राष्ट्र नहीं वोट है। आज जो देश तकनीक में पीछे हैं वे फिसड्डी ही हैं। आरक्षण वह चूहा है जो भीतर ...

राष्ट्र स्वस्वामी महाराज का चूहा शेर बन गया

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सरिता समुन्द्र की ओर बहती है, बहते-बहते पहाड़ पर नहीं चढने लगती। चन्द्रमा शीतल होता है, अचानक आग नहीं फेकने लगता। शेर मांस खाता है दाल चावल कभी नहीं। राम ने, कृष्ण ने अवतार लिया धर्म-संत रक्षा हेतु न कि उनसे खेलने हेतु। सभी दैविक पुरुष या तंत्र न चहरे बदलते, न उद्देश्य - चहरे बदलने वाले राम शत्रु होते हैं। केशव की कूटनीति जटिल थी किन्तु राष्ट्रीयता के पीछे शकुनि का पोषण नहीं करती थी। रोहिंग्या रहेंगे, देशी भगेंगे। घर वाले लड़ेंगे, बाहरी पलेंगे। राष्ट्र स्वस्वामी महाराज का चूहा शेर बन गया है - महाराज जी का जीवन संकट में आ गया है। गड़बड़ वहीँ हो गया जब भगवान् मोहक का अवतार कुयुग में हो गया। भगवान् ने करिश्मा दिखया तो भक्तों ने आरती सजाया। भगवान् ने भरमाय तो उन्होंने दीपक फूंक-फूंक कर बुझाया। लोग चकित हैं कि भगवान् भाई असली हैं या नकली?