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सम्बन्ध एक आपसी निर्भरता है

इस संसार में सम्बन्ध एक आपसी निर्भरता है और कुछ नहीं। कोई भी दो व्यक्ति एक ही सोच का हो ही नहीं सकता और सोच में अंतर लगाव को कम कर देता है। अतः किसी का साथ लम्बे समय तक आत्मीय नहीं रह सकता। आत्मीयता के दूसरे पक्ष को देखें तो जब तक स्वार्थ है तब तक ही आत्मीयता जीवित रहती है। उम्र बढ़ने के साथ ही व्यक्ति उसके लिए समय निकालता है जिसे वह चाहता है और जिसको नहीं चाहता उसके लिए समय न मिलने के बहाने बनाता है। वस्तुतः सब सबका होते हुए भी कोई किसी का नहीं है।   "लोग सम्बन्ध बनाने के लिए लालाइत रहते हैं, किन्तु कोई देख न ले इससे भयभीत भी रहते हैं।" -फ्रांज काफ्का "लोग ओछा सम्बन्ध बना लेते है जिसे वे प्यार कहते हैं, जबकि अकेलेपन से धीरे-धीरे मरने लगते है।" -फ्योदोर दोस्तोवस्की माँ-बाप अपने बच्चे की बड़ी सेवा करते हैं। इस सेवा का पारितोषिक बच्चा बाल स्नेह सुख के रूप में तुरंत भुगतान कर देता है। अब उससे और अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उम्मीद उस बालक से करनी चाहिए जो जेल में पैदा हुआ था। उसी से सम्बन्ध बनाओ क्योंकि वह जन्म से लेकर मृत्यु तक का सम्बन्धी है। उसे छोड़ने का असफल प्रयास त...

मजदूर को 500 रु और बाबू को 5000 रु रोज

एक मजदूर को 500 रुपया रोज और एक बाबू को 5000 रुपया रोज : इसके अतिरिक्त मजदूर का पसीना गार लिया जाता है और बाबू ऐसी रूम में गप्पें छानकर दिन बिताता है और थोड़ा बहुत जो काम करता है उसके लिए घूस लेता है। आरक्षण की मारामारी सिर्फ इसी वजह से है न कि दलित उत्थान के लिए। बहुत से देशों में उच्चतम प्रतिभा को छोड़कर, शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम की मजदूरी लगभग सामान होती है, इसलिए वहां सभी काम सम्मानजनक माने जाते है। सामान्य जीवन यापन के लिए मजदूर को कम से कम 1500 रुपये रोज मिलना चाहिए और एक बाबू को 2000 रुपयों से अधिक नहीं मिलना चाहिए। सांसद एवं बिधायकों को भी इसी अनुपात में अपने बेतन कम करने चाहिए। यदि ऐसा हो जाय तो आरक्षण की जरूरत नहीं होगी और नागरिकों को उनके कौशल के अनुसार काम भी मिल सकेगा। जिस देश में प्रतिभा की कदर है वहां शक्ति और सम्पन्नता है और जब देश संपन्न होता है तो उसका प्रभाव सारे समाज पर पड़ता है। चीन इसका जीता जागता उदहारण है। छोटे बड़े हर औजार का अपना महत्त्व है। केवल बड़े औजार से ही नाव नहीं बनती। हमारे देश में आरी से ठोंका जाता है और हथौड़े से चीरा जाता है। जो बौद्धिक काम अच्छे से क...

मुस्लिम और आरक्षित वर्ग

  देश जबसे आजाद हुआ तबसे पूरे कांग्रेस काल तक मुस्लिम की आर्थिक और सामाजिक स्थिति उतनी ही ख़राब थी जितनी कि आरक्षित वर्ग की थी। दोनों वर्ग मजदूर हुआ करते थे। मुसलिम ने कभी मांग नहीं किया कि उसे कोई आरक्षण चाहिए। उसने छोटे-छोटे उद्योग और छोटी-छोटी कारीगरी को अपना व्यसाय बनाया और अपनी मेहनत और पुरुषार्थ पर भरोसा करके जुट गया। मोदी सरकार ने उद्योग को ऋण इत्यादि से प्रोत्साहित किया और विजली एवं सडकों की व्यवस्था ठीक की इसका लाभ उठाकर मुस्लिम समाज एकदम बूस्ट कर गया। आज हिन्दू वैश्यों से व्यापारिक प्रतियोगिता कर रहा है। पैसा होने की वजह से अच्छे-अच्छे लोग उन्हें सलाम ठोकने लगे हैं। इधर क्या हुआ समाज के उत्थान हेतु खैरात चाहिए। हमें आरक्षण की भीख दे दो हम दबे कुचले हैं। चलो भाई आरक्षण दे दिया गया और हुआ क्या जो पहले से पढ़े-लिखे सक्षम थे, जिनकी सामाजिक स्थिति पहले से सवर्णों जैसी थी उन्होंने लपक लिया और ऐसा शील कर दिया कि उसकी कोई बूँद नीचे टपक ही न सकी। दलित अभी भी दलित है। वह अपने मजदूर साथी मुस्लिम के यहां मजदूर बन गया। जब तक स्वयं से उठने की इच्छा नहीं करोगे कोई तुम्हें उठाने के लिए खाल...

सवर्ण पलायन

20वीं सदी की शुरुआत में तमिलनाडु में सवर्णों के विरुद्ध मिशनरी समर्थक पेरियार ई.वी. रामासामी के नेतृत्व में 'आत्म-सम्मान आंदोलन' शुरू हुआ और उसने सवर्णों को पलायन करने के लिए विवश कर दिया। आज वहां सवर्ण नाम की चीज नहीं बची है। कश्मीर से हिन्दू सवर्णों का पलायन 1990 में हुआ जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार थी, जिसे भारतीय जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था। इस सरकार ने मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का गृह मंत्री बना रखा था और राज्यपाल शासन लागू हो चुका था। इसी वर्ष 7 अगस्त को मंडल आयोग लागू हुआ था और सवर्ण बच्चों ने सामूहिक आत्मदाह किया था। मंडल आयोग को जनवरी 1979 में मुरारजी देसाई की बीजेपी समर्थित जनतापार्टी की सरकार ने गठित किया था। बिहार में आरक्षण समर्थित घृणा की राजनीति लालू प्रसाद ने शुरू की। परिणामस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में सवर्णों का पलायन बिहार से हुआ। वे यूपी, दिल्ली सहित देश के विभिन्न राज्यों में भागकर सेटिल हुए। कुल मिलाकर सवर्ण पलायन में जातिवादी राजनीति की भूमिका रही है। आज एक बार फिर बीजेपी जातीय घृणा उगलने लगी है क्योंकि बागडोर जिसक...

बहन बेटी करने की राजनीति

  आज तक बहन बेटी करने की राजनीति नहीं हुई थी, वह भी हो रही है। वामियों को छुट्टा कर दिया गया है जाओ सनातनियों को जी भर गाली बको, उनकी बहन, बेटी करो। बड़े-बड़े अधिकारी हों, रावण हों, कंस हों सबके मुंह गंदे हो गए हैं। पहले हिन्दू समाज इतना असभ्य नहीं था। इसके विपरीत हिन्दू धर्म की अलख जगाने वाले साधू संतों के मुंह बंद कर दिए गए हैं। मंदिरों में डकैतियां पड़ रही हैं। शराब की इतनी दुकाने खुलीं हैं कि सभी जाति वर्ग के घर उजड़ रहे हैं। औरतें वस्त्रहीन विचरण कर रही हैं जिससे लब जिहाद सरल हो गया। शिक्षा की तो धज्जी उड़ा दिया है, पढ़ो या न पढ़ो सब पास। प्राथमिक विद्यालयों में सदाचार की शिक्षा समाप्त हो गयी है। चारों ओर असभ्यता का माहौल है, गाली गलौज है। कोई नाली में लुढ़का पड़ा है, कोई मुर्गा मटन नोच रहा है। यह स्थिति पूरे हिन्दू समाज की है। सबकी अगली पीढ़ी वर्बाद हुई जा रही है। जब राजा संस्कारी होता है तब देश में संस्कार फैलता है और जब व्यभिचारी होता है तो व्यभिचार का वातावरण बनता है। जब राजा शिक्षित होता है तब देश शिक्षा के क्षेत्र में आगे होता है किन्तु जब वह अशिक्षित होता तब असभ्यता नाचने लगती है...

भेड़ों के ग्राहक होते हैं शेरों के नहीं

 मीडिया ईरान, अमेरिका, यूक्रेन, रूस, चीन गई है। विद्वान प्रवक्ता दुनिया देख रहे हैं जन्तर-मन्तर नहीं। पक्ष-विपक्ष पार्टियां सभी काकरोचों को पालने में लगे हैं, गरुण को नहीं - अदाकारों, भेड़ों के ग्राहक होते हैं शेरों के नहीं ! आज सभी पार्टियों के लिए जंतरमंतर किष्किंधा है। आँख के अंधों, किष्किंधा में राम आएंगे और तुम अपने को बालि समझते हो, तुम सभी को ढेर होना ही है। आरक्षण के नाम पर सरकार का विरोध किया नहीं कि मेढक टों टों करके कांग्रेसी कहने लगते हैं। गुलामी के पौधों, आज बीजेपी भी कांग्रेस ही है, सभी पार्टियां कांग्रेस हैं और हम सभी का वहिष्कार करते हैं। देश की खिचड़ी आबादी में रामभक्तों का दम घुट रहा है - हमें अलग राष्ट्र चाहिए। मेढक कहे कि कोयल ने मुझे संगीत सीखने नहीं दिया तो क्या इसमें कोयल की कोई गलती है? बेर कहे कि ताड़ ने मुझे बड़ा होने नहीं दिया तो क्या ताड़ ने उन्हें रोका था? आरक्षण प्रेमियों, तुम्हारा विकास कभी नहीं हो सकता। जिस दिन नौकरी चली गई उस दिन तुम फिर जैसे थे वैसे हो जाओगे। कारण प्रमुख रूप से दो हैं : पहला तो तुम लोग राम द्रोही हो और दूसरा तुम्हारी सोच में पुरुषार्थ क...

अनुसूचित बच्चों की शिक्षा ही नहीं पालन पोषण

  अनुसूचित जनजातियां अधिकतर जंगलों में रहने वाले लोग हैं वे विकासशील सभ्यता में शामिल नहीं हो सके। अतः आरक्षण उनके लिए अति आवश्यक है। अनुसूचित जाति में सैकड़ों जातियां हैं वे मुख्य रूप से गावों में मजदूरी और शहरों में सफाई कार्य करते थे। अधिकतर लोग आज भी वही कर रहे हैं। चूंकि ये लोग ऐसे व्यवसाय में रहे हैं जहां इनकी खुद की सोच कभी विकसित हुई ही नहीं इसलिए इन्हें आरक्षण चाहिए। अब यह स्पष्ट हो गया कि इन्हें आरक्षण मिलना चाहिए किन्तु जिसने हवाई जहाज कभी देखा ही न हो उसे पायलेट बना दो तो क्या हवाई जहाज उड़ेगा? अतः आरक्षण देने से पहले इन्हें हुनरमंद अथवा शिक्षित करने की आवश्यकता है। क्या मजदूरों, वनवासियों या सफाई कर्मियों के बच्चो को शिक्षा के लिए समुचित प्रयास किये गए ? यदि शिक्षित किये गए होते तो मजदूरों के बच्चे आज भी मजदूर नहीं बन रहे होते। अब बताओ आरक्षण को लागू हुए आठ दशक होने वाले हैं तो अब तक आरक्षण का लाभ फिर किसे मिल रहा है? उत्तर मिलेगा कि उन लोगों को जो जाति से तो अनुसूचित थे किंतु वे पहले से ही सामान्य वर्ग के समानांतर शिक्षित व् सम्पन्न जीवन जी रहे थे। कोई भी वर्ग कितना ही ...

अबकी बार 400 पार

  2024 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी यह कह कर चूक गई कि 'अबकी बार 400 पार'। विपक्षी दलों ने इसका फायदा उठाया और प्रचारित कर दिया कि बाबा साहब के संविधान को बीजेपी बदल देना चाहती है। इस दूध से बिल्ली इस तरह से जली कि उसके दिमाक की गहराई में बैठ गया कि केवल दलित वोट से ही चुनाव जीते जा सकते हैं। फिर क्या था सरकार बहादुर को दलित वर्ग चाहिए चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उन्होंने अपने समर्पित वोटरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की और उनकी कीमत पर यूजीसी 2026 लाकर पटक दिया। सिद्धांत यह कहता है कि यदि किसी एक चीज का नुकसान हो गया हो तो उसको ठीक करने के लिए दूसरे मूल्यवान चीज को दांव पर नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ऐसे में दोनों हाथ से निकल सकते हैं। माहौल अब कुछ इसी तरह बन चुका है। लगता है सवर्ण अब कोई विकल्प खोज लेगा और दलित अपनी अगली पीढ़ी की वेरोजगारी से दुखी होकर पुरानी डाल पर लौटना पसंद करेगा। इसके अतिरिक्त एक और विषय है जिसे सरकार बहादुर को सोचना चाहिए। गहरे जातिवाद के आधार पर किसी एक प्रांत का चुनाव जीता जा सकता है किन्तु केंद्रीय सत्ता सभी वर्गों के वोटों से प्राप्त होती है जैसे ब...

Raksha Bandhan 2026

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  Rakshabandhan is celebrated on Shravana Poornima, the full moon day in the Lunar month of Shravan, which typically occurs in July or August on Gregorian calendar. On this day, sisters tie an amulet called rakhi around the wrists of their brothers as a symbol of the bond of protection and obligation. Sanatan culture defines every relationship as a divine bond between members of a family, which ultimately generates a sense of having natural obligations to each other and makes the family live comfortably. A father loves his son and daughter and brings them up, so does a mother; but the relationship between a brother and his sister is such that involves deep feelings and self-sacrificing attributes. A sister cares for her brother and a brother can do anything to protect his sister. This festival is also known as Shravani in Uttarakhand and in Maharashtra as Nariyal Poornima. South Indian Brahmins call it Avani Avittam. This day is very important for Brahmins as they perform Upakram –...

हिन्दू एकता का आधार ब्राह्मण

जैसे आँख दुनिया को देखती है किन्तु स्वयं को नहीं देख सकती, उसी तरह ब्राह्मण स्वयं कभी एक नहीं हो सका किन्तु यदि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एकता के सूत्र में किसी ने पिरोये रखा है तो वह ब्राह्मण है। घने जंगलों में आदिवासियों का जीवन प्राचीन हिन्दू संस्कृति पर आधारित है। आदिवासी समुदाय भी सूर्य, चंद्र, नदियों, पर्वतों और पेड़ों की पूजा करते हैं। कई स्थानों पर वे लोग भगवान शिव, राम जी या हनुमान जी जैसे देवी-देवताओं की भी पूजा करते हैं। इन्हें सनातन संस्कृति यदि ब्राह्मण ने नहीं दिया है तो फिर किसने दिया है? आदिगुरु शकराचार्य ने ही सनातन की पुनर्स्थापना की थी। आचार्य चाणक्य ने सिकंदर के विरुद्ध अखण्ड भारत की स्थापना की। उन्होंने नन्द साम्राज्य सहित सभी छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त करके विशाल मौर्य साम्राज्य का निर्माण किया। देश भर की अनुसूचित जातियां सनातन मान्यताओं में गहरी आस्था रखतीं हैं। ओबीसी और सवर्ण की तो बात ही छोडो। मुग़ल शासन काल में महाराज तुलसीदास ने राम चरित मानस की रचना करके सनातन को संरक्षित रखा। आदिकाल से अब तक सारे समाज को भागवत कथा, रीति रिवाज, उत्सव, महोत्सव, तीर्थ, व्रत आदि ...

आरक्षण हटाओ आन्दोलन

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आरक्षण संशोधन की मांग को लेकर आज सवर्ण समाज जन्तर-मन्तर पर इकठ्ठा हो गया है। एक भारी भीड़ वहां पहुंच रही है और पुलिस बैरिकेटिंग लगाकर उन्हें शामिल होने से रोक रही है। इतना ही नहीं सारी मीडिया इस सम्बन्ध में कोई खबर नहीं चला रही है। सारा कुछ केवल सोसल मीडिया पर चल रहा है। सरकार ने इन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए परमिशन भी नहीं दिया है यद्यपि परमिशन की आवश्यकता भी नहीं होती केवल सूचना देना ही पर्याप्त होता है ताकि सरकार उनके लिए आवश्यक सामाग्री मुहैया कराये। यहाँ भोजन पानी की व्यवस्था तो छोड़ो सरकार ने उनके लिए लट्ठ की व्यवस्था करके रखी है।   अतिउत्साह में सरकार बहादुर ने अपने पैरों पर उस दिन कुल्हाड़ी मारी थी जिस दिन यूजीसी लागू किया था। उन्होंने बड़े भावुक ढंग से कहा था "गोली मारनी है तो मुझे मारो मेरे दलित भाइयों को क्यों मार रहे हो, समाज की एकता को क्यों नष्ट कर रहे हो!" उसके बाद दलितों पर पैलेट गन चल जाते हैं। उन पर क्रूरता की हद हो जाती है। सरेआम झूठ बोलना है साहब को। सवर्ण बेचारा दलितों से पहले ही भयभीत है कि कहीं एससी/एसटी धारा न लग जाय, वह उनकी गाली खाता है, फिर भी उन्हे...

NAG PANCHAMI - Gudiya Fest

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King Parikshit was killed by the serpent king Takshak. His son Janamejaya decided to avenge the death of his father, so he had a yajna performed in order to decimate the serpent race. Sage Astika arrived there on Shravan Shukla Panchami, the fifth day of the bright half of the lunar month Sawan (July/August), and stopped him from sacrificing snakes. That day has since been observed as Naga Panchami, a festival of worshipping the deity Nag. In some other states like Bihar, Rajasthan, Gujarat, Nag Panchami is celebrated on the fifth day of the waning moon in the same month. Many people observe fast and offer prayers to please the deity Snake. They worship the god serpent by offering milk, kheer, flowers, etc., in the belief that it would keep their families safe from snake bites. Serpents have a very important role in our mythology. The powerful king of snakes, Nag Vasuki, who resides on the neck of Mahadev, coiled around Mount Mandara as the rope of a churning rod and made it possible ...

मंदिर लूट लिया

मंदिर लूट लिया जिसने भी, चाहे भगवाधारी हो, चाहे कमल उपासक हो, या चाहे संत पुजारी हो, वंशज है तैमूर लंग का, बाबर का वह नाती है, गज़नी की सेना का सैनिक, काला वह कुलघाती है। चोर पकड़ने वाले लगते, चोरों के हितकारी हैं, धूल झोकने वाले भी, सत्ता के अधम पुजारी हैं। पाखंडी हैं, वेधर्मी हैं, शातिर सत्तावादी हैं, चोर, लुटेरे, झूठे, कातिल, सारे ये अपराधी हैं। धर्म ध्वजा के रक्षक जागो, जागो पूत सनातन के ! राष्ट्रवाद के पोषक जागो, जिनको प्रेम पुरातन से ! नवयुग का निर्माण करो, अब नए तंत्र का मन्त्र बनो, उलझे भारत को अब कोई, सुलझाने का ग्रन्थ लिखो।

विप्र देवता

जिन्हें नहीं विश्वास स्वयं पर, वे समूह में चलते हैं, रातों में एकांत मार्ग पर, कदम नहीं रख सकते है। जो चलता है सदा अकेले, करता शयन अकेले है, वही असंभव संभव करता, भू पर शाम सबेरे है।   विप्र देवता, भेंड़ नहीं हो, न भैंसों की हो तुम भीड़ ! तुम ज्ञानी हो वंश बाघ के, मात्र राष्ट्र की तुम हो रीढ़। आँख दिखाते हैं गीदड़, तो खड़ी लोमड़ी गुर्राती एक कहीं यदि हो जाते, तो दुनिया तुमसे थर्राती।   तुम तो भरत तिवारी हो, वर्दी वालो पर भारी हो, हर भाई की फ़िक्र तुम्हें है, तुम तो राम पुजारी हो। शास्त्र बनाया है तुमने, तो शस्त्र बनाये भी तुमने, अलग संगठित होने में, फिर देर लगाया क्यों तुमने? -Poet Ramesh Tiwari

हिन्दू

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हिन्दू इतना विखरा क्यों है, क्यों वेधर्मी हुआ समाज? क्यों फैले निर्लज्ज, लालची, चोर, पियक्कड़, धोखेवाज? एक दूसरे के दुश्मन क्यों, कोई नहीं किसी का आज? किसी बाहरी के सम्मुख, पड़ जाती धीमी क्यों आवाज? अत्याचार किया मुगलों ने, किया उन्होंने था व्यभिचार, बना दिए हिन्दू से मुस्लिम, दूषित कर आचार विचार। ऊंची नीची खाई खोदी, जाति जाति को डाला फाड़, गाड़ दिया सब धर्म संस्कृति, गड्ढे में फिर सत्तर हाथ, बिप्र द्रोह की कुटिल चाल से, रीढ़ सनातन की तोड़ी, ब्रिटिश राज ने धर्म मिशनरी, नगर नगर भर में खोली। कहने को तो सैंतालीस में, देश हो गया था आज़ाद, किन्तु नीति जिनके गुलाम थे, वही गुलामी लागू आज। फूट डालकर राज करो, की नीति अभी भी चलती है, छुआछूत की रोटी कच्ची, पलटाकर अब सिकती है। हिरन पकड़कर नोचा करते, जैसे कुत्ते, चील, सियार, धर्म सनातन नोच रहे सब, पक्ष, विपक्षी औ सरकार।   अगर सुरक्षित रहना है तो, धर्म मानना ही होगा, धर्म विमुख गैरों के जूते, सर पर रखना ही होगा। तुम एससी या एसटी कोई, ओबीसी या पंडित हो, बनिया, ठाकुर, लाला, गूजर, हिन्दू खंड विखंडित हो। उससे पहले सब के सब, सुन लो तुम मारे जाओगे, दाढ़ी की बे...

राम मंदिर चोरी

जिस मंदिर के लिए लाखों लोगों ने जान दे दी, धन संपत्ति निछावर कर दिया उसी मंदिर के सम्पत्ति की चोरी करने वालों ने सिद्ध कर दिया कि हमारे समाज का बहुत बड़ा हिस्सा दुनिया को तो डरता है किन्तु ईश्वर से नहीं। हिन्दू एक फुटकर समाज है जिसमें एक हिस्सा धर्मनिष्ठ है, राष्ट्र भक्त है - वह प्रभु श्रीराम की श्रद्धा में अपना सर्वस्व अर्पित कर सकता है। वहीँ मनमाने, अनुशासनहीन, स्वार्थ में अंधे लोगों की अपार भीड़ भी है जो न धर्म में आस्था रखता है और न ही राष्ट्र के प्रति निष्ठावान है। एक वे लोग हैं जो करोड़ों के सुन्दर आभूषणों को पहनाकर अपने राम के सौंदर्य का दर्शन करना चाहते हैं एक वे हैं जो राम को मूर्ती समझकर उन आभूषणों की चोरी से नहीं विचलित होते। संसार में सुरक्षित और सशक्त वह समाज होता जो अपने धर्म में गहरी आस्था रखता है। इसीलिए मनुस्मृति कहती है "धर्मो रक्षति रक्षितः"। अमेरिका जैसा सुपर पावर ईरान को हिला न सका क्योंकि ईरानियों को अपने धर्म से शक्ति प्राप्त हो रही थी। छोटा सा इजराइल अपने धर्म और राष्ट्र निष्ठा की ताकत पर चारों और दुश्मनों से घिरे होने के वावजूद शेर की तरह जीता है। अफगानि...

ब्राह्मण

 हिन्दू समाज राजनीति से भ्रमित होकर अपने एक सशक्त भाग ब्राह्मण से वेवजह नफ़रत करता है। कहने को तो कांग्रेस ने देश को अज़्ज़ाद कराया उसने हिन्दू को और भी परतंत्र कर दिया था। हिन्दू अपने धर्म से सम्बंधित कोई भी बात सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता था। गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित राम चरित मानस ने घोर मुगलिया तूफ़ान में सनातन डीप को सुरक्षित रखा। हमारी संस्कृति को मिटा देने की अंग्रेजों की हर कोशिशें नाकाम हुई। वे ब्राह्मण थे जिन्होंने संघ जैसे संगठन को खड़ा किया। उसी संघ के ब्राह्मणों ने भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनाई जिसने सन 2014 में सत्ता राष्ट्रवादी लोगों को देकर देश को देश को वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान की। ब्राह्मण से हटकर हिन्दू सुरक्षित नहीं रह सकता और सनातन की अनुपस्थिति में किसी का जीवन जीने लायक नहीं बच सकता।   हिंदू समाज द्वारा ब्राह्मणों का तिरस्कार स्वयं के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। थोड़ी देर के लिए पूर्वाग्रह से दूर हो जाओ और सोचो, आप इस निष्कर्ष पर अवश्य आएंगे कि हिन्दू समाज को यदि कोई संगठित कर सकता है तो वह ब्राह्मण वर्ग ही है। कथा, संगीत एवं साहित्य के ...

सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा

एक देशी कहावत है : "सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा"। कहने का अर्थ है "न नौकरी न चाकरी, परीक्षा देशव्यापी"। अरे भाई बच्चों को क्यों भरमाये घूम रहे हो?साफ-साफ बताओ न कि नौकरी नहीं है, अतः आप लोग कोई दूसरा प्रबंध सोचो। लेकिन सरकार इतना स्पष्ट तब बोल सकती है जब उसका इरादा राष्ट्र निर्माण का हो। आज की स्थिति के अनुसार पारम्परिक शिक्षा और उस पर आधारित रोजगार महत्वहीन हो चुके हैं। इसलिए सामाजिक समता के लिए केवल नौकरी और आरक्षण ही एक मात्र रास्ता नहीं है और न ही 'स्कील इंडिया' कह देने से काम चलता है। दुनिया भर के विश्वविद्यालय की जगह प्रशिक्षु कुटीर कारखाने खोले जा सकते हैं। साथ ही विपणन, बाजार निर्माण, उत्पादन तकनीकी से सम्बंधित अध्ययन एवं शोध संस्थान का विकास करके नई पीढ़ी को उद्योगी, स्वावलम्बी एवं समृद्ध बनाया जा सकता है। किन्तु सरकार बहादुर को तो "फुट डालो, खैरात बांटो और निष्कंटक राज करो" ही करना है क्योंकि यह सबसे सरल तरीका है। बताओ देश को स्वतंत्रता से क्या लाभ हुआ? जनता जानती है सरकार देश का सुधार कर रही है और सरकार बहादुर मन ही मन सोच रहे हैं : ...

फ्री का राशन एवं दक्षिणा

  प्रधानमंत्री मोदी जी अक्सर कहते हैं कि गुजरातियों की रगों में व्यापार बसता है। उनमें जरूरत भांपकर अवसरों को मुनाफे में बदलने की जन्मजात क्षमता होती है। शायद मोदी जी की इसी क्षमता ने उन्हें चुनावी प्रतियोगिता में अपराजेय बनाये रखा है। विदेशों में आपकी व्यापारिक क्षमता तो किसी ने देखा नहीं किन्तु देश में आपके व्यापार की कुशलता अत्यंत प्रशंसनीय है। आपने जनता का एक भी रुपया केवल वहीँ खर्च किया है जहां आपका कुछ न कुछ लाभ रहा है। नियम तो यह है कि जनता के टैक्स से जनता को सरकरी चिकित्सा मुफ्त में मिलनी चाहिए किन्तु यदि ऐसा किया गया तो सरकार बहादुर जानते हैं कि जनता इसे अधिकार समझेगी, अहसान नहीं। पैसा हाथ में रखने पर ही जनता समझती है कि सरकार ने उसे कुछ दिया। सरकार ने जैसे कुछ लोगों के हाथ में आयुष्मान कार्ड रखा जनता गद्गद - वह भूल गई कि प्राइवेट हॉस्पिटल उनका खून चूस रहे हैं और स्वास्थ बीमा का बाज़ार भी तैयार कर रहे हैं। जो भी हो, जनता अहसान भी मानने लगी और व्यापार भी होने लगा। वस्तुतः जनता उसे भगवान समझती है जो उनके हाथ में फ्री का राशन एवं कुछ दक्षिणा देता है, जबकि वह भगवान् जिसकी वास्...

महान सर जी

विधायिका प्रजातंत्र का पहला स्तम्भ है। दूसरा महत्वपूर्ण स्तम्भ कार्यपालिका है। तीसरे पर न्यायपालिका आती है और चौथा और अंतिम स्तम्भ प्रेस या मीडिया को माना गया। इनमें कार्यरत लगभग सभी का उद्देश्य आज राष्ट्र निर्माण नहीं बल्कि अधिकतम धन को सोखना है। धन सोखने के चक्कर में प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ तो कब का नहीं गिर गया है। तीसरे स्तम्भ की बात करें तो धन के भार ने उसे आधा झुका दिया है। शेष दो खम्भे इतने मोठे हैं कि उनमें सारी अर्थव्यवस्था समा सकती है। 'पैसा फेको और भजन कराओ' के धंधे से जब मिडिया की टीआरपी गिरी तो सर जी लोगों ने मौके का फायदा उठा लिया और उन्हें हैक करने लगे। अपने धंधे की जमीन खिसकते देख मिडिया सर जी पर उखड़ पडी। अब सरजी और मिडिया की तू-तू-मैं-मैं से एक दूसरे की पोल खुलने लगी। सर जी लोगों का उद्देश्य कोई देश को शिक्षित करने का नहीं है, नहीं तो वे सबको इंजिनियर, डाक्टर, कलेक्टर बनाने के बजाय मिस्तरी, कारीगर, उद्योगी या उत्पादक भी बना रहे होते। उनके पढ़ाने से नहीं बल्कि उनकी सेटिंग से उनके बच्चे प्रतियोगी परीक्षा पास होते है। बस यहीं छोटी पूंजी वाले गुरूजी लोगों का धंधा...