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मंदिर लूट लिया

मंदिर लूट लिया जिसने भी, चाहे भगवाधारी हो, चाहे कमल उपासक हो, या चाहे संत पुजारी हो, वंशज है तैमूर लंग का, बाबर का वह नाती है, गज़नी की सेना का सैनिक, काला वह कुलघाती है। चोर पकड़ने वाले लगते, चोरों के हितकारी हैं, धूल झोकने वाले भी, सत्ता के अधम पुजारी हैं। पाखंडी हैं, वेधर्मी हैं, शातिर सत्तावादी हैं, चोर, लुटेरे, झूठे, कातिल, सारे ये अपराधी हैं। धर्म ध्वजा के रक्षक जागो, जागो पूत सनातन के ! राष्ट्रवाद के पोषक जागो, जिनको प्रेम पुरातन से ! नवयुग का निर्माण करो, अब नए तंत्र का मन्त्र बनो, उलझे भारत को अब कोई, सुलझाने का ग्रन्थ लिखो।

विप्र देवता

जिन्हें नहीं विश्वास स्वयं पर, वे समूह में चलते हैं, रातों में एकांत मार्ग पर, कदम नहीं रख सकते है। जो चलता है सदा अकेले, करता शयन अकेले है, वही असंभव संभव करता, भू पर शाम सबेरे है।   विप्र देवता, भेंड़ नहीं हो, न भैंसों की हो तुम भीड़ ! तुम ज्ञानी हो वंश बाघ के, मात्र राष्ट्र की तुम हो रीढ़। आँख दिखाते हैं गीदड़, तो खड़ी लोमड़ी गुर्राती एक कहीं यदि हो जाते, तो दुनिया तुमसे थर्राती।   तुम तो भरत तिवारी हो, वर्दी वालो पर भारी हो, हर भाई की फ़िक्र तुम्हें है, तुम तो राम पुजारी हो। शास्त्र बनाया है तुमने, तो शस्त्र बनाये भी तुमने, अलग संगठित होने में, फिर देर लगाया क्यों तुमने? -Poet Ramesh Tiwari

हिन्दू

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हिन्दू इतना विखरा क्यों है, क्यों वेधर्मी हुआ समाज? क्यों फैले निर्लज्ज, लालची, चोर, पियक्कड़, धोखेवाज? एक दूसरे के दुश्मन क्यों, कोई नहीं किसी का आज? किसी बाहरी के सम्मुख, पड़ जाती धीमी क्यों आवाज? अत्याचार किया मुगलों ने, किया उन्होंने था व्यभिचार, बना दिए हिन्दू से मुस्लिम, दूषित कर आचार विचार। ऊंची नीची खाई खोदी, जाति जाति को डाला फाड़, गाड़ दिया सब धर्म संस्कृति, गड्ढे में फिर सत्तर हाथ, बिप्र द्रोह की कुटिल चाल से, रीढ़ सनातन की तोड़ी, ब्रिटिश राज ने धर्म मिशनरी, नगर नगर भर में खोली। कहने को तो सैंतालीस में, देश हो गया था आज़ाद, किन्तु नीति जिनके गुलाम थे, वही गुलामी लागू आज। फूट डालकर राज करो, की नीति अभी भी चलती है, छुआछूत की रोटी कच्ची, पलटाकर अब सिकती है। हिरन पकड़कर नोचा करते, जैसे कुत्ते, चील, सियार, धर्म सनातन नोच रहे सब, पक्ष, विपक्षी औ सरकार।   अगर सुरक्षित रहना है तो, धर्म मानना ही होगा, धर्म विमुख गैरों के जूते, सर पर रखना ही होगा। तुम एससी या एसटी कोई, ओबीसी या पंडित हो, बनिया, ठाकुर, लाला, गूजर, हिन्दू खंड विखंडित हो। उससे पहले सब के सब, सुन लो तुम मारे जाओगे, दाढ़ी की बे...

राम मंदिर चोरी

जिस मंदिर के लिए लाखों लोगों ने जान दे दी, धन संपत्ति निछावर कर दिया उसी मंदिर के सम्पत्ति की चोरी करने वालों ने सिद्ध कर दिया कि हमारे समाज का बहुत बड़ा हिस्सा दुनिया को तो डरता है किन्तु ईश्वर से नहीं। हिन्दू एक फुटकर समाज है जिसमें एक हिस्सा धर्मनिष्ठ है, राष्ट्र भक्त है - वह प्रभु श्रीराम की श्रद्धा में अपना सर्वस्व अर्पित कर सकता है। वहीँ मनमाने, अनुशासनहीन, स्वार्थ में अंधे लोगों की अपार भीड़ भी है जो न धर्म में आस्था रखता है और न ही राष्ट्र के प्रति निष्ठावान है। एक वे लोग हैं जो करोड़ों के सुन्दर आभूषणों को पहनाकर अपने राम के सौंदर्य का दर्शन करना चाहते हैं एक वे हैं जो राम को मूर्ती समझकर उन आभूषणों की चोरी से नहीं विचलित होते। संसार में सुरक्षित और सशक्त वह समाज होता जो अपने धर्म में गहरी आस्था रखता है। इसीलिए मनुस्मृति कहती है "धर्मो रक्षति रक्षितः"। अमेरिका जैसा सुपर पावर ईरान को हिला न सका क्योंकि ईरानियों को अपने धर्म से शक्ति प्राप्त हो रही थी। छोटा सा इजराइल अपने धर्म और राष्ट्र निष्ठा की ताकत पर चारों और दुश्मनों से घिरे होने के वावजूद शेर की तरह जीता है। अफगानि...

ब्राह्मण

 हिन्दू समाज राजनीति से भ्रमित होकर अपने एक सशक्त भाग ब्राह्मण से वेवजह नफ़रत करता है। कहने को तो कांग्रेस ने देश को अज़्ज़ाद कराया उसने हिन्दू को और भी परतंत्र कर दिया था। हिन्दू अपने धर्म से सम्बंधित कोई भी बात सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता था। गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित राम चरित मानस ने घोर मुगलिया तूफ़ान में सनातन डीप को सुरक्षित रखा। हमारी संस्कृति को मिटा देने की अंग्रेजों की हर कोशिशें नाकाम हुई। वे ब्राह्मण थे जिन्होंने संघ जैसे संगठन को खड़ा किया। उसी संघ के ब्राह्मणों ने भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनाई जिसने सन 2014 में सत्ता राष्ट्रवादी लोगों को देकर देश को देश को वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान की। ब्राह्मण से हटकर हिन्दू सुरक्षित नहीं रह सकता और सनातन की अनुपस्थिति में किसी का जीवन जीने लायक नहीं बच सकता।   हिंदू समाज द्वारा ब्राह्मणों का तिरस्कार स्वयं के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। थोड़ी देर के लिए पूर्वाग्रह से दूर हो जाओ और सोचो, आप इस निष्कर्ष पर अवश्य आएंगे कि हिन्दू समाज को यदि कोई संगठित कर सकता है तो वह ब्राह्मण वर्ग ही है। कथा, संगीत एवं साहित्य के ...

सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा

एक देशी कहावत है : "सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा"। कहने का अर्थ है "न नौकरी न चाकरी, परीक्षा देशव्यापी"। अरे भाई बच्चों को क्यों भरमाये घूम रहे हो?साफ-साफ बताओ न कि नौकरी नहीं है, अतः आप लोग कोई दूसरा प्रबंध सोचो। लेकिन सरकार इतना स्पष्ट तब बोल सकती है जब उसका इरादा राष्ट्र निर्माण का हो। आज की स्थिति के अनुसार पारम्परिक शिक्षा और उस पर आधारित रोजगार महत्वहीन हो चुके हैं। इसलिए सामाजिक समता के लिए केवल नौकरी और आरक्षण ही एक मात्र रास्ता नहीं है और न ही 'स्कील इंडिया' कह देने से काम चलता है। दुनिया भर के विश्वविद्यालय की जगह प्रशिक्षु कुटीर कारखाने खोले जा सकते हैं। साथ ही विपणन, बाजार निर्माण, उत्पादन तकनीकी से सम्बंधित अध्ययन एवं शोध संस्थान का विकास करके नई पीढ़ी को उद्योगी, स्वावलम्बी एवं समृद्ध बनाया जा सकता है। किन्तु सरकार बहादुर को तो "फुट डालो, खैरात बांटो और निष्कंटक राज करो" ही करना है क्योंकि यह सबसे सरल तरीका है। बताओ देश को स्वतंत्रता से क्या लाभ हुआ? जनता जानती है सरकार देश का सुधार कर रही है और सरकार बहादुर मन ही मन सोच रहे हैं : ...

फ्री का राशन एवं दक्षिणा

  प्रधानमंत्री मोदी जी अक्सर कहते हैं कि गुजरातियों की रगों में व्यापार बसता है। उनमें जरूरत भांपकर अवसरों को मुनाफे में बदलने की जन्मजात क्षमता होती है। शायद मोदी जी की इसी क्षमता ने उन्हें चुनावी प्रतियोगिता में अपराजेय बनाये रखा है। विदेशों में आपकी व्यापारिक क्षमता तो किसी ने देखा नहीं किन्तु देश में आपके व्यापार की कुशलता अत्यंत प्रशंसनीय है। आपने जनता का एक भी रुपया केवल वहीँ खर्च किया है जहां आपका कुछ न कुछ लाभ रहा है। नियम तो यह है कि जनता के टैक्स से जनता को सरकरी चिकित्सा मुफ्त में मिलनी चाहिए किन्तु यदि ऐसा किया गया तो सरकार बहादुर जानते हैं कि जनता इसे अधिकार समझेगी, अहसान नहीं। पैसा हाथ में रखने पर ही जनता समझती है कि सरकार ने उसे कुछ दिया। सरकार ने जैसे कुछ लोगों के हाथ में आयुष्मान कार्ड रखा जनता गद्गद - वह भूल गई कि प्राइवेट हॉस्पिटल उनका खून चूस रहे हैं और स्वास्थ बीमा का बाज़ार भी तैयार कर रहे हैं। जो भी हो, जनता अहसान भी मानने लगी और व्यापार भी होने लगा। वस्तुतः जनता उसे भगवान समझती है जो उनके हाथ में फ्री का राशन एवं कुछ दक्षिणा देता है, जबकि वह भगवान् जिसकी वास्...

महान सर जी

विधायिका प्रजातंत्र का पहला स्तम्भ है। दूसरा महत्वपूर्ण स्तम्भ कार्यपालिका है। तीसरे पर न्यायपालिका आती है और चौथा और अंतिम स्तम्भ प्रेस या मीडिया को माना गया। इनमें कार्यरत लगभग सभी का उद्देश्य आज राष्ट्र निर्माण नहीं बल्कि अधिकतम धन को सोखना है। धन सोखने के चक्कर में प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ तो कब का नहीं गिर गया है। तीसरे स्तम्भ की बात करें तो धन के भार ने उसे आधा झुका दिया है। शेष दो खम्भे इतने मोठे हैं कि उनमें सारी अर्थव्यवस्था समा सकती है। 'पैसा फेको और भजन कराओ' के धंधे से जब मिडिया की टीआरपी गिरी तो सर जी लोगों ने मौके का फायदा उठा लिया और उन्हें हैक करने लगे। अपने धंधे की जमीन खिसकते देख मिडिया सर जी पर उखड़ पडी। अब सरजी और मिडिया की तू-तू-मैं-मैं से एक दूसरे की पोल खुलने लगी। सर जी लोगों का उद्देश्य कोई देश को शिक्षित करने का नहीं है, नहीं तो वे सबको इंजिनियर, डाक्टर, कलेक्टर बनाने के बजाय मिस्तरी, कारीगर, उद्योगी या उत्पादक भी बना रहे होते। उनके पढ़ाने से नहीं बल्कि उनकी सेटिंग से उनके बच्चे प्रतियोगी परीक्षा पास होते है। बस यहीं छोटी पूंजी वाले गुरूजी लोगों का धंधा...

पुण्यश्लोका माता अहिल्याबाई होल्कर

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  अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर (वर्तमान में अहिल्यानगर) के 'चौंडी' गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था । 1733 में आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह मालवा के सूबेदार मल्हारराव होल्कर के पुत्र खांडेराव होल्कर के साथ हुआ था। 1754 में कुम्हेर के युद्ध में उनके पति वीरगति को प्राप्त हुए। पति की मृत्यु के बाद सती होने की इच्छा जताने पर, उनके ससुर मल्हारराव ने उन्हें रोक लिया और प्रशासनिक व सैन्य प्रशिक्षण दिया । 1766 में ससुर मल्हारराव के निधन और बाद में अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु के बाद, 1767 में उन्होंने मालवा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली। उन्होंने अपनी राजधानी को इंदौर से स्थानांतरित कर नर्मदा नदी के किनारे बसे महेश्वर में स्थापित किया। उन्होंने देश भर में 1000 से अधिक मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) का पुनर्निर्माण उन्हीं के द्वारा 1780 में करवाया गया था। इसके अलावा अयोध्या, मथुरा, सोमनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ और रामेश्वरम जैसे प्रमुख तीर्थों में भी उन्होंने भव्य निर्माण कार्य करवाए।...

नौटंकी से जनता फुसलाई जा सकती है - देश नहीं चलता

  हिन्दूवाद के दरवाजे से अटल और आडवाणी जी ने सत्ता में प्रवेश किया था। पाकिस्तान प्यार की खिड़की से अटल जी अपने गुड फील के साथ बाहर निकल गए और जिन्ना मोह की सुरंग से आडवाणी जी। अब आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने बयान दिया है कि हमें पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। इसका समर्थन करते हुए सम्बद्ध संगठन वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा कि पाकिस्तान के लोग अंततः अपने इतिहास को समझेंगे और भारत में अपने ‘पूर्वजों की जड़ों और परंपराओं’ की ओर लौटेंगे। यदि ज़रा भी इतिहास और बायलॉजी का ज्ञान हो तो सोचो अखंड भारत का मुस्लिम सभी कन्वर्टेड नहीं है बल्कि अधिकतर अनुवांशिक है। सोचो क्या संभव है कि तालाब का पानी ऊपर चढ़कर झरने से मिलने आ जाय? निश्चित ही नहीं, फिर यदि झरने का पानी बहकर तालाब में मिलेगा तब क्या वह तालाब के पानी को साफ़ करेगा या स्वयं अपनी स्वच्छता को खो देगा? विदेशी टिप्पड़ियों से भयभीत होकर अपने सिद्धांतों से क्यों समझौता कर रहे हो भाई। हमारी कमी सदैव यही रही है कि विवाद से बचने के लिए हम अपने ही बच्चे को दोषी कहकर उसे थप्पड़ जड़ देते हैं। बीजेप...

आंधी-तूफ़ान के पहले असहनीय उमस का मौसम

  भारतीय समाज बहुत तेजी से संक्रमित हो रहा है। गाली, अभद्रता युक्त मस्खरी सोसल मीडिया पर अत्यंत लोकप्रिय हो रही है। नयी पीढ़ी में अनुशासन तो भूल जाओ। बच्चों में न माँ-बाप का डर है न ही शिक्षकों का। इसका दोषी आज की शिक्षा पद्यति है क्योंकि पाठ्यक्रमों मे नैतिक शिक्षा केवल औपचारिकता है। इसमें समाज भी उतना ही दोषी है क्योंकि भौतिकता के इस युग में मानव को पैसों के आगे सदाचार एवं शिष्टाचार बकवास की चीज लगती है। पेशेवर-नैतिकता के अभाव में आकंठ भ्रष्टाचार है। एक समय था जब लोग पुस्तक को विद्या देवी का स्वरुप मानते थे। आज बच्चों में पुस्तक पढ़ने का धैर्य समाप्त हो चुका है। पढ़ना तो छोड़ो कोई पुस्तक देखना नहीं चाहता। परिणाम यह हुआ कि लोगों में मानव जीवन से सम्बंधित गंभीर जानकारी शून्य हो रही है। युवा किसी व्यसन, किसी आदत, किसी आचरण के परिणाम से अनभिज्ञ हो रहे हैं। सभ्य जीवन की परिभाषा मांस मदिरा बन गया है। राजनीति में मानव मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। समाज इतना व्यभिचारी हो गया है कि वह पशु से भी गिरा गुजरा बन गया है। ब्राह्मण के प्रति उसकी शिक्षा पर आश्रित जनसमूह में घृणा की राजनीति भा...

बयान वाइरल हुआ

विदेश मंत्री यस जयशंकर का एक बयान इधर सम्पूर्ण विश्व में वाइरल हुआ है जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका के प्रभाव का वह युग समाप्त हो गया है जब उसे चुनौती देने की औकात किसी में नहीं थी। शीत युद्ध के बाद से विश्व में शक्ति बहुध्रुवीय होना प्रारम्भ हो गई थी। राष्ट्रपति ओबामा के समय से यूनाइटेड स्टेट्स ने अपनी विदेश नीति बदली है और दुनिया के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से हाथ खींचे हैं, उदाहरण के तौर पर राष्ट्रपति बाइडेन ने अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी की। अब विश्व उस ओर लगातार बढ़ रहा है जहां किसी भी एक देश का एकाधिकार नहीं चल सकता और यह भारत के उदय का समय है। फिर उन्होंने जोर देकर कहा है कि भारत का उदय उसकी अपनी क्षमताओं पर निर्भर होगा, न कि दूसरों से प्रेरित होगा। इस बदलते वैश्विक क्रम में भारत ने संतुलित दृष्टिकोण पर बल दिया है।

ऑपरेशन संकल्प

भारत की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जीत तब हुई जब ईरान ने भारत के लिए सुरक्षित मार्ग देने की बात कही है। इस बीच भारत ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए "ऑपरेशन संकल्प" के तहत युद्धपोत और टास्क फोर्स तैनात किए हैं। ये युद्धपोत एलपीजी 'शिवालिक' और 'नंदा देवी' टैंकरों को सुरक्षित मार्ग प्रदान करने के बाद होर्मुज के पश्चिम में फंसे 22 भारतीय जहाजों की सुरक्षा के लिए मुस्तैद हैं। इसके अतिरिक्त वे अपने चाबहार बंदरगाह की भी निगरानी कर रहे हैं। यह तैनाती खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की आपात स्थिति से निपटने और भारतीय ध्वज वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए की गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य

शायद अमेरिका ने सोचा होगा कि ईरान स्वयं अपने दुश्मनों को आमत्रित कर लेगा क्योंकि वह उसके मिडिल ईस्ट देशों में स्थित मिलिट्री वेस पर जैसे हमला करेगा वे सारे देश युद्ध में शामिल होने लगेंगे। इसके अतिरिक्त होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के हर देशों के जहाज गुजरते हैं। ईरान इस रास्ते को बंद करेगा जरूर तो भारत सहित सारे यूरोपीय देश अपने-अपने जहाज़ों को निकालने के लिए बल प्रयोग करने लगेंगे। हो सकता है अमेरिका का यह कैलकुलेशन फेल हो गया क्योंकि सभी देशों ने किनारा कर लिया। चीन और भारत ने ईरान से तेल खरीद की डील कर ली और अपने जहाज मजे से निकाल रहे हैं। अब अमेरिका की गति सांप छछूंदर की हो गई है।

एक दो लोग शराब पीते थे, आज एक दो लोग नहीं पीते है

दस पंद्रह वर्ष पहले गावों में एक दो लोग शराब पीते थे, आज एक दो लोग नहीं पीते है। मांस खाने की स्थति तो यह हो गई है कि आदमी गिद्ध हो गया है। देश नशे की लत में है। वहीँ हमारी सरकार जी को वोट का एडिक्शन है। उन्हें जब वोट की तलब आती है तब चाहे जिस कीमत में मिले उन्हें वोट चाहिए ही चाहिए। चाहे हिन्दू समाज टूट जाय, चाहे देश में एक और बंगलादेश देश बन जाय, कुछ हो जाय बस वोट चाहिए। वे वोट के लिए सारे देश को अपढ़ निरक्षर बना सकते हैं। वोट के कारण उन्हें यदि सबसे अधिक दुश्मनीं है तो ब्राह्मणों से है। जबकि जब वे वोट के लिए तड़पने लगते हैं तब ब्राह्मण ही उसकी व्यवस्था करते हैं चाहे अपना रक्त ही क्यों न पिलाना पड़ जाय। ब्रह्मण भारतीय शिक्षा का आधार है - उस पर हमला देश के शिक्षा तंत्र पर हमला है। ब्राह्मण अध्यापक से पढ़ेंगे तभी आरक्षण के लाभ मिलेंगे। फिर भी आज ब्राह्मण को पिछड़ा नफ़रत करता है, उससे ज्यादा दलित नफ़रत करता है, ब्राह्मण, क्षत्रिय में कुछ ऐसे भी वर्ग हैं जो अंदर ही अंदर प्रतिस्पर्धी हैं। पैसे वाला वैश्य नौकरी में ब्राह्मण लड़की/लड़कों को रखना पसंद करता है क्योंकि अधिकतर वे धोखेवाज नहीं होते ह...

राक्षस VS ब्राह्मण

मानवता में केवल दो वर्ग हैं। दारू पीकर बलबलाने वाले, खैरात पर बिकने वाले, व्यभिचारी, भक्षाभक्ष्य, ब्र्ह्मद्रोही, नारायणद्रोही, पतित आदि सभी राक्षस हैं। इसके विपरीत वे सभी ब्राह्मण हैं जो सदाचारी हैं, ज्ञानी हैं, धर्मनिष्ठ हैं। ब्राह्मण वे भी हैं जो हरि या हर के समर्पित भक्त हैं। त्रिलोकी नाथ राम जी को गरीब नवाज कहा जाता है। उनके गरीब दुश्चरित्र नहीं थे। यूजीसी ब्राह्मण दमन का क़ानून है, रावण संहिता है, अधर्म है। इस सरकार के अच्छे दिनों का भण्डार समाप्त होने वाला है इसलिए उसका मतिभ्रम हुआ है और उसने ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा नष्ट करने का निर्णय किया है। ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ही वासुदेव की प्रतिष्ठा है और उसे कलंकित करने का अर्थ है विश्व में विनाश। ब्राह्मण ने तप करके ब्रह्माण्ड में महादेव के दर्शन किये हैं। वह माता भवानी का प्रतिनिधि है इसलिए किसी भी तूफ़ान में वह पथभ्रष्ट नहीं हुआ है। मोदी जी अभी भी समय है, धर्म का साथ दो - धृतराष्ट्र मत बनों, नहीं तो पाण्डव केवल पांच नहीं हैं, उनके साथ सुदर्शनधारी भी हैं। सब कुछ नष्ट होगा।

जनता को चिंता हो करता नेता वही

जनता की चिन्ता नेता की चिन्ता नहीं। जनता को चिंता हो करता नेता वही। बंगलादेश में हिन्दुओं की सामूहिक ह्त्या हुई। जनता डरी और इंतज़ार करने लगी। कब भारत की सेना जाएगी, बंगलादेश में तबाही मचाएगी। सेना तो गई नहीं, तेल जाने लगा सहायता जाने लगी। भाषण हुआ रोहिंगिया की बाढ़ आ गयी। जनता चीखी रोहिंग्या भीड़ हमारी रोजी-रोटी खा गई। उनके आधार चुपके से बनने लगे, हम भारत के नागरिक हैं वे कहने लगे। गरजा हिन्दू का ठेकेदार अब तो होगा आरपार। आतंक मिटेगा दुनिया से, हिन्दू राष्ट्र बनेगा भारत ये। अचानक मोहब्बत की हूक हुई, मदरसों की डिग्री वैलिड हो गई। सदियों से दलितों पर अत्याचार का किया गया परचार। छिपकर इसके पीछे बैठ, बनाया एससी/एसटी एक्ट। आकाशवाणी हुई "यदि बंटोगे तो कटोगे"। पीछे से आई यूजीसी बोली, “देखते हैं मिलजुल कर तुम कैसे रहोगे !“ मुसलामान होता कभी नहीं देश के साथ, वे बोलते रहे और करते रहे सबका साथ उनका विकास। जहां जहां है भारी भीड़, वहीँ परोसें मोदी खीर। प्रतिभा बैठे जहां-जहां, वे धूल उड़ाएं वहां-वहां। हिन्दू हिन्दू मात्र दिखावा, राष्ट्रवाद पाखण्ड। वोट देवता जहां जहां, वहीँ आदि अव अन्त।

कानून अन्याय बन जाता है

  चूंकि मोदी कानून का उद्देश्य वोट होता है न कि सामाजिक न्याय इसलिए जब वह मीठे जहर की तरह फैलता है तब अन्याय बन जाता है। महिला सशक्तिकरण पर हर महिला यही कहेगी कि पुरुषों ने महिलाओं पर शादियों से अत्याचार किये हैं। ये भ्रम है जिसका लाभ मोदी सरकार उठाती है और महिला सुरक्षा का एकतरफा कानून बनाकर महिला वोटबैंक तैयार करती है। वास्तव में, इस कानून से जब असामाजिक महलाएं निर्दोष पुरुषों को ब्लैमेल करती हैं तो सरकार आँख बंद कर लेती है। अब यदि महिला से पूछा जाय कि आप किसी पुरुष की बेटी हैं, किसी की बहन हैं, किसी की पत्नी हैं, किसी की मां हैं - क्या इन पुरुषों को आपके सुरक्षा की चिंता नहीं है और यदि है तो क्या वे पुरुष नहीं हैं? वे भूल गयीं कि इस कानून का शिकार यदि उनका भाई या बाप होता है तो उन्हें कितनी पीड़ा होगी। महिला पुरुष एक दूसरे की पूरक हैं उनमें वैमनस्य पैदा करना अपराध है। महिला सुरक्षा का योगी कानून तुरंत अपराध रोकता है - महिला पुरुष में भेद नहीं करता। इसी तरह यूजीसी के नए नियम ओबीसी, एससी और सामान्य वर्ग में न्याय नहीं करते बल्कि जहर घोलते हैं और मोदी पार्टी के लिए वोट बैंक तैयार कर...

हिन्दुराष्ट्र बनाने का सपना

  आपने कहा कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। चलो हम आपकी बात मान लेते हैं किन्तु यूजीसी के परमाणु बम की धमकी तो आपने दिया ही है। यह वह बम है कि यदि फटा तो केवल सामान्य वर्ग को ही नहीं अपितु सारे समाज को अस्त-व्यस्त कर देगा। इसका आभास उन अज्ञानियों को नहीं है जो इसे लागू कराने के लिए उतावले हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि हिन्दू समाज में भेदभाव का अर्थ है दूसरे बहुसंख्यक समाज को पुनः सत्ता तक पहुंचने में रास्ता साफ़ करना। यदि आप अंधभक्तों के न हो सके तो आप दलित, पिछड़ों के भी कैसे हो सकते हैं? हम सारे हिन्दू समाज अगड़े-पिछड़े सभी ने उम्मीद की थी कि आप अवैध्य नागरिकों को देश से निकाल देंगे। हम सभी उम्मीद किये थे कि आप सामान नागरिक संहिता लाएंगे। हम आशावान थे कि धर्म के आधार पर एक बार बटवारा हो चुका है अतः आप देश को हिन्दुराष्ट्र बनाने का हमारा सपना सच करेंगे। हम सभी ने सोचा था कि आप क्रीमी-लेयर को सामान्य में शामिल करते रहेंगे ताकि आरक्षण के होते हुए भी आरक्षित और अनारक्षित वर्ग से भेदभाव मिटता रहे और हिन्दू समाज संगठित होकर सशक्त हो जाय। हमने सोचा था कि जिन्होंने धर्म परिवर्तित कर लिया है ...

उस जनता की रीढ़ तोड़ने लगे जो देश की रीढ़

  वोट-प्रेम और राष्ट्र-प्रेम दो अलग-अलग चीजें हैं। राष्ट्र को नुकसान किये वगैर यदि सत्ता प्राप्त किया जाय तो सकारात्मक राजनीति कहते हैं किन्तु राष्ट्र को कमजोर करके सत्ता हथियाने को नकारात्मक राजनीति कहते हैं। खैरात बांटना देश को दोहरा नुकसान पहुंचाता है : खाने वाले को निकम्मा करता है तथा टैक्स से कर्मयोगी जनता को हतोत्साहित करके उसका विकास रोकता है। चीन में हर घर में उद्योग है यहां हर घर में ठर्रा है और मुफ्त का अनाज है। हर देश में सभी नागरिकों के अधिकार सामान हैं और मुफ्त की योजनाएं केवल गरीब, असहाय लोगों के लिए हैं। यहां विशिष्ट वर्गों के अफसरों, नेताओं और अमीरजादों के लिए कानूनी सुरक्षा है और आरक्षण की भीख है। यदि यही उनके गरीबों को मिल जाय तो उनका कल्याण हो जाय। साथ ही लाभ प्राप्त लोगों का सामान्य में जुड़ने से सामाजिक बैमनस्य भी दूर हो जाय। इतनी नकारात्मक राजनीति से मोदी सरकार का जी नहीं भरा तो उसे देश की प्रतिभाओं का दमन सूझ गया और यूजीसी लेकर आ गयी। स्वयं राजा जब हीन भावना का शिकार हो जाय तो देश का विघटन कौन रोक सकता है। मैं पिछड़ा चाय वाला दीनहीन कहते-कहते सामान्य वर्ग से स्...