फ्री का राशन एवं दक्षिणा

 

प्रधानमंत्री मोदी जी अक्सर कहते हैं कि गुजरातियों की रगों में व्यापार बसता है। उनमें जरूरत भांपकर अवसरों को मुनाफे में बदलने की जन्मजात क्षमता होती है। शायद मोदी जी की इसी क्षमता ने उन्हें चुनावी प्रतियोगिता में अपराजेय बनाये रखा है। विदेशों में आपकी व्यापारिक क्षमता तो किसी ने देखा नहीं किन्तु देश में आपके व्यापार की कुशलता अत्यंत प्रशंसनीय है। आपने जनता का एक भी रुपया केवल वहीँ खर्च किया है जहां आपका कुछ न कुछ लाभ रहा है। नियम तो यह है कि जनता के टैक्स से जनता को सरकरी चिकित्सा मुफ्त में मिलनी चाहिए किन्तु यदि ऐसा किया गया तो सरकार बहादुर जानते हैं कि जनता इसे अधिकार समझेगी, अहसान नहीं। पैसा हाथ में रखने पर ही जनता समझती है कि सरकार ने उसे कुछ दिया। सरकार ने जैसे कुछ लोगों के हाथ में आयुष्मान कार्ड रखा जनता गद्गद - वह भूल गई कि प्राइवेट हॉस्पिटल उनका खून चूस रहे हैं और स्वास्थ बीमा का बाज़ार भी तैयार कर रहे हैं। जो भी हो, जनता अहसान भी मानने लगी और व्यापार भी होने लगा। वस्तुतः जनता उसे भगवान समझती है जो उनके हाथ में फ्री का राशन एवं कुछ दक्षिणा देता है, जबकि वह भगवान् जिसकी वास्तविक कमाई उन्हें दी गई है उसे वे शैतान की निगाह से देखते हैं। आज स्थिति यह है कि यदि किसी मध्यम वर्गीय परिवार में एक सदस्य गंभीर बीमार हो गया तो समझो परिवार ने जमीन जायदाद से हाथ धो लिया। शिक्षा की स्थिति भी भिन्न नहीं है क्योंकि सरकार बहादुर नहीं चाहते है कि आप ज्ञानी बन कर उनसे सवाल करने लगें। तुम भीड़ हो भीड़ ही ठीक हो। तुम्हारे बच्चों को पांच हज़ार वेतन वाले शिक्षक पढ़ाएंगे और प्राइवेट विद्यालय तुमसे पांच लाख वार्षिक कमाएंगे। सरकारी विद्यालय और अस्पताल इस आधुनिक युग में भी मध्ययुगीन है। सरकार का उन पर कोई नियंत्रण नहीं क्योंकि इसमें व्यापार हो रहा है। "मियाँ की टोपी, मियाँ का सर।" यही हुआ न?

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