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Showing posts from May 24, 2026

पुण्यश्लोका माता अहिल्याबाई होल्कर

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  अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर (वर्तमान में अहिल्यानगर) के 'चौंडी' गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था । 1733 में आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह मालवा के सूबेदार मल्हारराव होल्कर के पुत्र खांडेराव होल्कर के साथ हुआ था। 1754 में कुम्हेर के युद्ध में उनके पति वीरगति को प्राप्त हुए। पति की मृत्यु के बाद सती होने की इच्छा जताने पर, उनके ससुर मल्हारराव ने उन्हें रोक लिया और प्रशासनिक व सैन्य प्रशिक्षण दिया । 1766 में ससुर मल्हारराव के निधन और बाद में अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु के बाद, 1767 में उन्होंने मालवा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली। उन्होंने अपनी राजधानी को इंदौर से स्थानांतरित कर नर्मदा नदी के किनारे बसे महेश्वर में स्थापित किया। उन्होंने देश भर में 1000 से अधिक मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) का पुनर्निर्माण उन्हीं के द्वारा 1780 में करवाया गया था। इसके अलावा अयोध्या, मथुरा, सोमनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ और रामेश्वरम जैसे प्रमुख तीर्थों में भी उन्होंने भव्य निर्माण कार्य करवाए।...

नौटंकी से जनता फुसलाई जा सकती है - देश नहीं चलता

  हिन्दूवाद के दरवाजे से अटल और आडवाणी जी ने सत्ता में प्रवेश किया था। पाकिस्तान प्यार की खिड़की से अटल जी अपने गुड फील के साथ बाहर निकल गए और जिन्ना मोह की सुरंग से आडवाणी जी। अब आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने बयान दिया है कि हमें पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। इसका समर्थन करते हुए सम्बद्ध संगठन वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा कि पाकिस्तान के लोग अंततः अपने इतिहास को समझेंगे और भारत में अपने ‘पूर्वजों की जड़ों और परंपराओं’ की ओर लौटेंगे। यदि ज़रा भी इतिहास और बायलॉजी का ज्ञान हो तो सोचो अखंड भारत का मुस्लिम सभी कन्वर्टेड नहीं है बल्कि अधिकतर अनुवांशिक है। सोचो क्या संभव है कि तालाब का पानी ऊपर चढ़कर झरने से मिलने आ जाय? निश्चित ही नहीं, फिर यदि झरने का पानी बहकर तालाब में मिलेगा तब क्या वह तालाब के पानी को साफ़ करेगा या स्वयं अपनी स्वच्छता को खो देगा? विदेशी टिप्पड़ियों से भयभीत होकर अपने सिद्धांतों से क्यों समझौता कर रहे हो भाई। हमारी कमी सदैव यही रही है कि विवाद से बचने के लिए हम अपने ही बच्चे को दोषी कहकर उसे थप्पड़ जड़ देते हैं। बीजेप...

आंधी-तूफ़ान के पहले असहनीय उमस का मौसम

  भारतीय समाज बहुत तेजी से संक्रमित हो रहा है। गाली, अभद्रता युक्त मस्खरी सोसल मीडिया पर अत्यंत लोकप्रिय हो रही है। नयी पीढ़ी में अनुशासन तो भूल जाओ। बच्चों में न माँ-बाप का डर है न ही शिक्षकों का। इसका दोषी आज की शिक्षा पद्यति है क्योंकि पाठ्यक्रमों मे नैतिक शिक्षा केवल औपचारिकता है। इसमें समाज भी उतना ही दोषी है क्योंकि भौतिकता के इस युग में मानव को पैसों के आगे सदाचार एवं शिष्टाचार बकवास की चीज लगती है। पेशेवर-नैतिकता के अभाव में आकंठ भ्रष्टाचार है। एक समय था जब लोग पुस्तक को विद्या देवी का स्वरुप मानते थे। आज बच्चों में पुस्तक पढ़ने का धैर्य समाप्त हो चुका है। पढ़ना तो छोड़ो कोई पुस्तक देखना नहीं चाहता। परिणाम यह हुआ कि लोगों में मानव जीवन से सम्बंधित गंभीर जानकारी शून्य हो रही है। युवा किसी व्यसन, किसी आदत, किसी आचरण के परिणाम से अनभिज्ञ हो रहे हैं। सभ्य जीवन की परिभाषा मांस मदिरा बन गया है। राजनीति में मानव मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। समाज इतना व्यभिचारी हो गया है कि वह पशु से भी गिरा गुजरा बन गया है। ब्राह्मण के प्रति उसकी शिक्षा पर आश्रित जनसमूह में घृणा की राजनीति भा...