हिन्दू



हिन्दू इतना विखरा क्यों है, क्यों वेधर्मी हुआ समाज?
क्यों फैले निर्लज्ज, लालची, चोर, पियक्कड़, धोखेवाज?
एक दूसरे के दुश्मन क्यों, कोई नहीं किसी का आज?
किसी बाहरी के सम्मुख, पड़ जाती धीमी क्यों आवाज?

अत्याचार किया मुगलों ने, किया उन्होंने था व्यभिचार,
बना दिए हिन्दू से मुस्लिम, दूषित कर आचार विचार।
ऊंची नीची खाई खोदी, जाति जाति को डाला फाड़,
गाड़ दिया सब धर्म संस्कृति, गड्ढे में फिर सत्तर हाथ,
बिप्र द्रोह की कुटिल चाल से, रीढ़ सनातन की तोड़ी,
ब्रिटिश राज ने धर्म मिशनरी, नगर नगर भर में खोली।

कहने को तो सैंतालीस में, देश हो गया था आज़ाद,
किन्तु नीति जिनके गुलाम थे, वही गुलामी लागू आज।
फूट डालकर राज करो, की नीति अभी भी चलती है,
छुआछूत की रोटी कच्ची, पलटाकर अब सिकती है।
हिरन पकड़कर नोचा करते, जैसे कुत्ते, चील, सियार,
धर्म सनातन नोच रहे सब, पक्ष, विपक्षी औ सरकार।
 
अगर सुरक्षित रहना है तो, धर्म मानना ही होगा,
धर्म विमुख गैरों के जूते, सर पर रखना ही होगा।
तुम एससी या एसटी कोई, ओबीसी या पंडित हो,
बनिया, ठाकुर, लाला, गूजर, हिन्दू खंड विखंडित हो।
उससे पहले सब के सब, सुन लो तुम मारे जाओगे,
दाढ़ी की बेरहम जुल्म से, भाग कहाँ को जाओगे?
 
तब देखेंगे संविधान को, कैसे आप बचाते हो,
कानूनी रक्षा में सबको, तब भी क्या धमकाते हो?
तब देखेंगे तुम्हें डाक्टर, कौन बनाना चाहेगा,
सरकारी दफ्तर में तुमको, कौन देखना चाहेगा?
तब देखेंगे वेधर्मी की लाज, बचाते हो कब तक,
आसमान से आई पोथी, नहीं पढोगे तुम कब तक?
तब देखेंगे मनुस्मृति को, फिर भी क्या तुम पढ़ते हो,
घृणा ईर्ष्या की उल्टी, क्या तब भी तुम कर सकते हो?
तब देखेंगे चर्र तुम्हारी, फिर भी बची हुई है क्या,
गाली भीगी चीभ तुम्हारी, चटर-चटर कर सकती क्या?
-Poet Ramesh Tiwari 

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