पुण्यश्लोका माता अहिल्याबाई होल्कर

 




अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर (वर्तमान में अहिल्यानगर) के 'चौंडी' गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था । 1733 में आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह मालवा के सूबेदार मल्हारराव होल्कर के पुत्र खांडेराव होल्कर के साथ हुआ था। 1754 में कुम्हेर के युद्ध में उनके पति वीरगति को प्राप्त हुए। पति की मृत्यु के बाद सती होने की इच्छा जताने पर, उनके ससुर मल्हारराव ने उन्हें रोक लिया और प्रशासनिक व सैन्य प्रशिक्षण दिया । 1766 में ससुर मल्हारराव के निधन और बाद में अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु के बाद, 1767 में उन्होंने मालवा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली। उन्होंने अपनी राजधानी को इंदौर से स्थानांतरित कर नर्मदा नदी के किनारे बसे महेश्वर में स्थापित किया। उन्होंने देश भर में 1000 से अधिक मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) का पुनर्निर्माण उन्हीं के द्वारा 1780 में करवाया गया था। इसके अलावा अयोध्या, मथुरा, सोमनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ और रामेश्वरम जैसे प्रमुख तीर्थों में भी उन्होंने भव्य निर्माण कार्य करवाए। उन्होंने अपने राज्य में कन्या शिक्षा और महिला सशक्तिकरण को बहुत महत्व दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने 13 अगस्त 1795 को अपनी अंतिम सांस ली। आज भी भारतीय इतिहास में उन्हें एक आदर्श, प्रजा-वत्सल और महान धर्म-रक्षक के रूप में अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है।



अबला नहीं हुआ करती हैं भारत की महिलाएं,

अंधियारों से नहीं डरी हैं कभी हमारी माताएं।

तीर और तलवार खिलौने उनने खेला

बड़े-बड़े संग्राम समर को उनने झेला ।

उनने जब भी राज किया इतिहास उन्होंने बना दिया,

राजनीति में अपना सिक्का तब तब उनने चला दिया।

बच्चो को ही नहीं पालना उनको आया,

घर में सारा जीवन उनने नहीं बिताया।

उनने जब भी राज किया तो प्यार प्रजा पर लुटा दिया,

एक एक व्यक्ती की पीड़ा का समुचित उपचार किया।

इंदौरी महारानी ऐसी एक अहिल्या बाई थी,

भारत के कोने कोने में धर्म ध्वजा फहराई थी।

वह महादेव की परम सेविका महाराष्ट्र में जन्मी थी,

जब वर्ष तीन सौ पूर्व देश की दशा भयानक विगड़ी थी।

पुण्यश्लोका माता की इस वर्ष जयंती त्रिशदी,

उसके वंशज मना रहे हैं शहर गाँव हर गली गली।

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