कानून अन्याय बन जाता है

 

चूंकि मोदी कानून का उद्देश्य वोट होता है न कि सामाजिक न्याय इसलिए जब वह मीठे जहर की तरह फैलता है तब अन्याय बन जाता है। महिला सशक्तिकरण पर हर महिला यही कहेगी कि पुरुषों ने महिलाओं पर शादियों से अत्याचार किये हैं। ये भ्रम है जिसका लाभ मोदी सरकार उठाती है और महिला सुरक्षा का एकतरफा कानून बनाकर महिला वोटबैंक तैयार करती है। वास्तव में, इस कानून से जब असामाजिक महलाएं निर्दोष पुरुषों को ब्लैमेल करती हैं तो सरकार आँख बंद कर लेती है। अब यदि महिला से पूछा जाय कि आप किसी पुरुष की बेटी हैं, किसी की बहन हैं, किसी की पत्नी हैं, किसी की मां हैं - क्या इन पुरुषों को आपके सुरक्षा की चिंता नहीं है और यदि है तो क्या वे पुरुष नहीं हैं? वे भूल गयीं कि इस कानून का शिकार यदि उनका भाई या बाप होता है तो उन्हें कितनी पीड़ा होगी। महिला पुरुष एक दूसरे की पूरक हैं उनमें वैमनस्य पैदा करना अपराध है। महिला सुरक्षा का योगी कानून तुरंत अपराध रोकता है - महिला पुरुष में भेद नहीं करता। इसी तरह यूजीसी के नए नियम ओबीसी, एससी और सामान्य वर्ग में न्याय नहीं करते बल्कि जहर घोलते हैं और मोदी पार्टी के लिए वोट बैंक तैयार करते हैं। इस कानून से दलित और पिछड़े को दुश्मनी के अतरिक्त मिलना कुछ नहीं है फिर भी मोदी-मोदी क्योंकि उनके दिमाक में भरा है कि सवर्णों ने उन पर अत्याचार किया था। सामान्य को छोडो, कानून के अनुसार एससी/एसटी छात्र किसी ओबीसी छात्र पर आरोप लगा सकता है। तो क्या ओबीसी छात्र का भविष्य नहीं वर्वाद होगा? आंकड़े सिद्ध करते हैं कि एससी/एसटी पर सबसे ज्यादा अत्याचार और भेदभाव या तो ओबीसी करता है या अल्पसंख्यक, सामान्य तो सिर्फ बदनाम है। हिन्दू समाज में जितनी जातिया हैं वे इंजन के पुर्जे की तरह हैं - कोई भी पुर्जा निकल दोगे इंजन बंद हो जाएगा। सामान्य अलग हो जाय तो शेष वर्ग आर्थिक और सांस्कृतिक संकट से बच नहीं सकते।

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