सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा

एक देशी कहावत है : "सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा"। कहने का अर्थ है "न नौकरी न चाकरी, परीक्षा देशव्यापी"। अरे भाई बच्चों को क्यों भरमाये घूम रहे हो?साफ-साफ बताओ न कि नौकरी नहीं है, अतः आप लोग कोई दूसरा प्रबंध सोचो। लेकिन सरकार इतना स्पष्ट तब बोल सकती है जब उसका इरादा राष्ट्र निर्माण का हो। आज की स्थिति के अनुसार पारम्परिक शिक्षा और उस पर आधारित रोजगार महत्वहीन हो चुके हैं। इसलिए सामाजिक समता के लिए केवल नौकरी और आरक्षण ही एक मात्र रास्ता नहीं है और न ही 'स्कील इंडिया' कह देने से काम चलता है। दुनिया भर के विश्वविद्यालय की जगह प्रशिक्षु कुटीर कारखाने खोले जा सकते हैं। साथ ही विपणन, बाजार निर्माण, उत्पादन तकनीकी से सम्बंधित अध्ययन एवं शोध संस्थान का विकास करके नई पीढ़ी को उद्योगी, स्वावलम्बी एवं समृद्ध बनाया जा सकता है। किन्तु सरकार बहादुर को तो "फुट डालो, खैरात बांटो और निष्कंटक राज करो" ही करना है क्योंकि यह सबसे सरल तरीका है। बताओ देश को स्वतंत्रता से क्या लाभ हुआ? जनता जानती है सरकार देश का सुधार कर रही है और सरकार बहादुर मन ही मन सोच रहे हैं : जनता को क्या वेवकूफ बनाकर नचनी नाच नचा रहे हैं ! देश में मुसलमान हैं तो उनसे नफ़रत पैदा करके वोटों का ध्रुवीकरण अत्यंत सरल कार्य है। इसके बदले यदि सरकार चाहे तो धीरे-धीरे कल्याणकारी योजनों के साथ जनसँख्या नियंत्रित कर सकती है और अधिकतम को भारतीय संस्कृति की मुख्य धारा में विलय के लिए विवश भी कर सकती है। यहां घास उगाई जाती है और फसल मिटाई जाती है। सरकार बहादुर समस्या समाधान के लिए नहीं हैं। देश में जितनी अधिक समस्या होगी, देश पर शासन करना उतना ही सरल होगा। देश यदि समृद्ध और शिक्षित हो गया तो देश पर अदाकार राज नहीं कर सकेंगे।

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