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सामाजिक एकता के भाषण

  जब समाज तोड़ने के कानून बन रहे होते हैं तब उसके पहले सामाजिक एकता के भाषण होने लगते हैं। उदहारण के तौर पर "एक रहोगे तो सेफ रहोगे" या "बंटोगे तो कटोगे" भाषण के बाद यूजीसी आता है और जाति-जाति में दुश्मनी घोल कर रख देता है। भाषण आता है "सबका साथ, सबका विकास" किन्तु सवर्णों के खून पसीने की कमाई को उड़ाता है नेता और खाते हैं देश के बोझ खैराती। भाषण होता है सबके साथ सामान न्याय की और एससी/एसटी एक्ट से अन्याय का बांध खोल दिया जाता है। कार सेवकों पर गोली चलवाने वाले मुख्य मंन्त्री के बारे में तीखी बयानबाजी की जाती है किन्तु उनका सम्मान पदम् विभूषण से होता है। सारे विरोध के वावजूद अंकिता भंडारी हत्याकांड के आरोपी दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राजपाल नियुक्त कर दिया जाता है। भाषण होते हैं हिंदूवाद के और नीतियां बनती हैं अल्पसंख्यक कल्याण की। साथ ही जो वर्ग हिंदुत्व का आधार है उसे खलनायक बना दिया जाता है। औरंगजेब ने हिंदुत्व को समाप्त करने के लिए हार्डवेयर पर हमला किया था यहाँ तो हिन्दू सॉफ्टवेयर ही डिलीट करने की कोशिश चल रही है। मोहम्मद गजनवी ने मंदिरों को लुटेरो...

एक पति/पत्नी व्रती

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करवा चौथ पति-पत्नी के मध्य निष्ठा और प्रेम स्थापित करने का व्रत है। एक पति/पत्नी व्रती का परिवार प्रारम्भ से अंत तक सुखी और स्वस्थ रहता है। कुछ महिलाओं का कहना है कि हमें 40 वर्ष की उम्र में दूसरी शादी कर लेनी है तो करवा चौथ व्रत का क्या मतलब, पति की लम्बी उम्र हो या कल मर जाय इससे हमें क्या लेना-देना है। रामायण में सूर्पणखा इन्हीं महिलाओं की प्रतीक है। उसकी नाक कट गई ! ऐसी महिलाओं के दांत कम उम्र में गिर जाते हैं, बाल पक जाता है और शकल चुड़ैल सी हो जाती है। इसके अतिरिक्त, वे वृद्धावस्था में जो घोर नर्क भोगती हैं वह अवर्णीय है। कुछ अन्य महिलायें करवा चौथ को पुरुषों की गुलामी का प्रतीक मानती हैं। कुछ कहती हैं कि यह ब्राह्मणों के द्वारा बनाया हुआ ढकोसला है, पाखंड है - इसके पीछे कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। त्योहारों में इन्हें वैज्ञानिक प्रमाण चाहिए, सर के दर्द के लिए पैरों की मालिश चाहिए। पूर्वजों की बनाई हुई मान्यताओं और परम्पराओं को तुम जैसे घनचक्कर समझ सकते तो यह धरती स्वर्ग होती। हमारे सारे त्योहारों का आधार मनोविज्ञान है न कि भौतिक विज्ञान। पश्चिमी सभ्यता ने विज्ञान के चक्कर में कभ...

Karva Chauth

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  In olden days, the wives of Indian warriors used to fast and pray on the fourth day of the dark fortnight in the month of Kartik (October and November) every year for the safe return of their spouses. They called this day Karva Chauth or Karaka Chaturthi. Karwa or Karaka means a clay vase used for offering water to the deity: it refers to a religious service known as Arghya. The Chaturthi or Chauth denotes the fourth day. Married women observe a one-day fast for the long and happy lives of their husbands. Parents present their married daughters with gifts and freshly harvested grains. Celebrants paint pictures of Lord Shiva, Mata Gauri, Ganesh, the Sun, the Moon, household articles and karawa on the walls; and in front of it they decorate the floor with rangoli in advance. They take feni and milk on the eve of the festival, as a pre-dawn meal known as sargi so that they may spend the day of fasting without water. The fast begins at dawn and ends at the visibility of moon in the e...

कुत्ता तो कुत्ता होता है

  कुत्ते को उसका मालिक कितने ही डंडे मारे किन्तु घूमकर वह दरवाजे पर आता ही है। वैसे भी कोई विकल्प नहीं है, वेचारा जाए कहाँ ? हर दरवाजे पर दो-चार कुत्ते बैठे हैं। कुत्ता तो कुत्ता होता है कोई शेर तो होता नहीं है कि अपने परिवार के साथ अलग साम्राज्य बना ले। बड़ी संख्या में सियार भी तो हैं अन्दर कन्दर के इकट्ठे हो गए : हुक्काआआ....हुवाँआँआँ....! उनकी आवाज सुनकर कुछ और कुत्ते भागे और अपने मालिक के दरवाजे खड़े होकर सियारों को जवाब देने के लिए मुंह ऊपर किया और म्यूजिक कंपनी की तरह एक के बाद एक: होंओंओं...... कुत्तों का मालिक भेड़िया अब कुत्तों को नहीं सियारों को पालना चाहता है। उधर सियारों का तथाकथित नेता लकड़बग्घा उनके प्यार में इतना दीवाना है कि वह उनका मुंह चाटता है। सभी कहते हैं कि गली-गली में कुत्ते जीना तोबा किये हुए हैं किन्तु कोई यह नहीं कहता कि कुत्ते न होते तो सियार भी न होते क्योंकि लकड़बग्घे सियारों से याराना तो किये हुए हैं किन्तु अंदर ही अंदर इस ताक में हैं कि कुत्ते हटें नहीं कि वे सियारों की गर्दन धर-दबोचे। जो भी हो, गली के कुत्तों की कौन कदर करता है ! हाँ, यदि वे जंगली हो जाएँ...

दैत्य और दानव के मध्य विकल्प

लोग पूछते हैं अब विकल्प क्या है? इन्हें कौन बताये कि दैत्य और दानव के मध्य विकल्प नहीं होते। ये भोंपड़े फिर कहते हैं, "देश सोरोस के हाथों सौंप दोगे, देश द्रोहियों को आमंत्रित करोगे, देश को पकिस्तान बना दोगे?" अब कोई इन गधों से पूछे अभी कौन सा हिन्दू राष्ट्र बना जा रहा है? मंदिरों से उन्हें राम नहीं चाहिए बल्कि पैसे चाहिए। जिसके कारण गो कट रही है, गुरु अपमानित है और गंगा गंदी हो रही है। दिल ठण्डा करने वाला डायलॉग आता है "एक रहोगे तो सेफ रहोगे"। कुछ ही दिन बाद: "बोल कालिया कितनी जातियां हैं रे ! सबके टुकड़े-टुकड़े होकर रहेंगे।" उन्होंने प्रतिज्ञा की "सबका साथ सबका विकास।" और होने लगी इनके कैश से उनकी ऐश। आखिर कौन सी हलुवा, पूड़ी मिली जा रही है हमें? हमारे बच्चों के लिए विद्यालय प्रतिबंधित करने की शाजिश चल रही है, हम गाली खाते रहें किन्तु जवाब भी नहीं दे सकते, हर कदम पर हमारे लिए कांटे बिछे हैं - कब जेल हो जाय कोई पक्का नहीं, हमारे लिए एक के बाद एक नौकरियों के दरवाजे बन्द होते जा रहे हैं - आरक्षण 100 प्रतिशत की ओर बढ़ रहा है, हमारी अपने ही देश में वो हाल...

दुश्मनी नहीं फिर भी सभी दुश्मन

आज आप अपने ही समाज में सहज नहीं हैं। बात करते समय आपको ध्यान रखना पड़ता है कि आप किस जाति के व्यक्ति से बात कर रहे हैं। किसी से कोई दुश्मनी नहीं फिर भी सभी एक दूसरे के दुश्मन हैं। एक जाति वाला दूसरे जाति वाले को ऐसे देखता है कि जैसे दोनों ने एक दूसरे के बाप की ह्त्या की हो। दलित से बातें करना तो बिजली के तार पर काम करने जैसा है। सरकारी कार्यालयों में डेलीवेज चपरासी अधिकतर सवर्ण होते हैं - उन्हें तो ये लोग बात-बात में माँ बहन की गाली देते रहते हैं और दूसरों को ब्रम्हास्त्र की धमकी। सनातन समाज में मूल रूप से वर्ण व्यवस्था थी। ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र पदवी या उपाधियाँ होती थी - जो जिस योग्य होता था उसे वही पदवी मिलती थी। जब विदेशियों की घुसपैठ होने लगी तब भारतीय नस्ल को बचाने के लिए इसे जन्म से जोड़ दिया गया था। पौधे, फसलें, जानवर सब एक जैसे नहीं होते - सबकी जातियां होती हैं। क्या सभी को ब्राह्मणों ने बनाया है? यदि मानते हो कि ब्राह्मणों ने बनाया है तो वह ईश्वर है। जातिवाद सरकारें करें, जातिवाद सभी करें और दोष ब्राह्मण को? जिसने आर्थिक अथवा शारीरिक असमर्थता के अतिरिक्त जाति के आधार प...

मार्मिक कहानी

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  जीवन अमृत अचानक जहाज़ में अफ़रा-तफ़री मच गई । “ हे भगवान अब क्या होगा ! बचाओ ! बचाओ ! अब बचने का कोई रास्ता नहीं – प्रभु मुझे स्वीकार करो , मैं आ रहा हूँ ! मुझे तो नर्क मिलेगा , प्रार्थना के लिए अब समय ही नहीं ! ”   मौत के भय से बौखलाए यात्री ऐसा कह - कह कर इधर - उधर भटकने लगे । सबके चहरे उड़े-उड़े , सब घबड़ाये हुए , दरवाजे की ओर भीड़ लगाने लगे । “ देखो कह रहा था ट्रेन से चलो , आसमानी दुर्घटना में बचने की कोई गुंजाईश नहीं होती , ” एक बृद्ध अपनी पत्नी से कह ही रहा था कि जहाज़ एक झाड़ी पर आ गिरा । उसी के साथ न जाने कैसे दरवाजा खुल गया और एक झुण्ड भर लोग ज़मीन पर आ गिरे । कुछ तो तुरंत मर गए और कुछ थोड़ी देर कराहने के बाद मरे किन्तु उस झुण्ड के ऊपर पड़े दो युवक बच गए । उधर आग की लपटों ने जहाज़ को लपेट लिया । सहमा हुआ समीर थोड़ी देर बाद अपना सर उठाता है और उठकर बाहर आता है । फिर आँख फैलाकर देखने लगता है कि उनमें से और कौन जीवित है । उसकी निगाह अपने साथी रजत पर पड़ती है जो उठने की कोशिश कर रहा होता है । समीर आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ता है और सहारा देकर उसे बाहर निका...