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न्याय के डिब्बे में अन्याय

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  एक थाने में प्रभारी साहब अपनी कुर्सी पर विराजमान हैं। उनके साथ वहां बैठे कुछ अन्य लोग ठहाके लगा रहे हैं। इतने में वहां दो व्यक्ति प्रकट होते हैं : काले पोशाक में एक वकील और एक सामान्य सा आदमी।   वकील एक लिखित आवेदन पत्र थानाध्यक्ष को देता है और अपने साथ वाले व्यक्ति को आगे करते हुए कहता है : "सर, इस आदमी को देखो, यह अत्यंत गरीब और असहाय दलित है। आज सबेरे अपनी पत्नी के साथ यह अपने खेत में फसल काट रहा था। पड़ोस के गाँव में एक दबंग रहता है जिसका नाम राम शंकर है। वह लाठी लेकर वहां आया, इस वेचारे को भद्दी भद्दी जातिगत गाली दी। इसकी पत्नी के कपडे खींच लिए और उसके साथ अभद्र व्योहार किया। किसी तरह दोनों जान बचाकर भागे किन्तु इसकी पत्नी रास्ते में वेहोश हो गई। वो तो कहिये इसके घर के दो तीन लोग वहां पहुंच गए, नहीं तो इसकी पत्नी मर ही गई होती। इसके बाद राम शंकर ट्रैक्टर ट्राली लेकर आया और इसकी कटी हुई फसल को लादकर ले गया। इनके छोटे-छोटे दो बच्चे हैं। रोज मजदूरी से परिवार पलता है।" थानाध्यक्ष बिना कुछ सोचे एफआईआर दर्ज करता हैं और केश की जांच के लिए फ़ाइल को ऊपर बढ़ा देता है।   कुछ दिन...

फैलती हुई विदेशी संस्कृति

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  जब बीजेपी को सत्ता में लाया गया था तब उससे उम्मीद की गई थी कि वह हिन्दू समाज को संगठित करेगी और किसी भी बाहरी , अतिवादी संस्कृति को फूलने-फ़ैलने से रोकेगी। किन्तु पिछले बारह वर्षों के दौरान चीजें इस उम्मीद के विपरीत हुईं। बाबा साहब अम्वेडकर के समय से दलितों में मनुवादियों से इतनी नफ़रत बढ़ी कि वे बड़ी संख्या में पकिस्तान और बंगलादेश चले गए। वहां उनके साथ जो अत्याचार हुआ उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। हिन्दुस्तान में इन लोगों को उसका विरोध करना चाहिए था किन्तु हुआ क्या ? यहां के दलितों में बंगलादेशियों या पाकिस्तानियों से प्यार बढ़ गया और उनके लिए आंदोलन होने लगे। इनकी चले तो सवर्णों को भारत से बाहर कर दें और खुद अतिवादियों के हाथों शहीद हो जाएँ। सवर्ण अपनी सुरक्षा के साथ इनकी भी सुरक्षा की बात करता है फिर भी इन्हें सवर्णों से ही परेशानी है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम इन्हें काट कर फेंक देते हैं फिर भी ये उन्हें प्यार करते हैं। सच में ये प्यार नहीं करते बल्कि जिससे भयभीत होते हैं उन्हें बाप्पा कहते हैं और जिनसे इन्हें भय नहीं होता उन्हें ये लोग गाली देते हैं। जब ये लोग सवर्णों को गाली दे र...

ईश्वर की उपस्थिति

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  इस दुनिया में यदि कोई चीज सबसे बड़ी और स्पष्ट दिखती है तो वह ईश्वर की उपस्थिति है। साफ़-साफ़ दिखता है कि संसार में एक बहुत बड़ा सिस्टम है जो आदिकाल से निरंतर काम कर रहा है और जो सबके अस्तित्व और जीवन का कारण है। सभी जानते हैं कि किसी ने कुछ नहीं बनाया फिर भी सब कुछ है। अंधों के पापा कहते हैं : 'भगवान है कहाँ?' अबे दिन-अंधेर ! यदि मैं कहूँ कि तुझमें जान नहीं है। तब तो नाराज हो जायेगा और कहेगा : "क्या मैं मर गया हूँ?" अब बता तेरे में जान कहाँ है ? तेरे कंप्यूटर में इंटरनेट चलता है - अब बता इंटरनेट लम्बा-पतला, काला-गोरा कैसा है ? खम्भे के तार में बिजली दौड़ रही है - बता उसमें बिजली पतली है कि मोटी है, बिल्ली जैसी है कि लोखड़ी जैसी ? अबे धकेलू, हर मंदिर में भगवान् है, तू खोपड़ी से भटांधर है इसलिए नहीं दिखता। यदि गंगा का पानी गंदा न किया गया होता तो वह स्वास्थ्य वर्धक है कि नहीं ? यदि कह दिया गया कि उसमें स्नान करने से पाप धुल जाते हैं तो कौन सा ब्राह्मणवाद हो गया ? देशाटन से मनोरोग दूर होते हैं कि नहीं ? यदि तीर्थयात्रा से पाप कटेंगे कह दिया गया तो कौन सा पाखंड हो गया ? पारिवा...

सामाजिक एकता के भाषण

  जब समाज तोड़ने के कानून बन रहे होते हैं तब उसके पहले सामाजिक एकता के भाषण होने लगते हैं। उदहारण के तौर पर "एक रहोगे तो सेफ रहोगे" या "बंटोगे तो कटोगे" भाषण के बाद यूजीसी आता है और जाति-जाति में दुश्मनी घोल कर रख देता है। भाषण आता है "सबका साथ, सबका विकास" किन्तु सवर्णों के खून पसीने की कमाई को उड़ाता है नेता और खाते हैं देश के बोझ खैराती। भाषण होता है सबके साथ सामान न्याय की और एससी/एसटी एक्ट से अन्याय का बांध खोल दिया जाता है। कार सेवकों पर गोली चलवाने वाले मुख्य मंन्त्री के बारे में तीखी बयानबाजी की जाती है किन्तु उनका सम्मान पदम् विभूषण से होता है। सारे विरोध के वावजूद अंकिता भंडारी हत्याकांड के आरोपी दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राजपाल नियुक्त कर दिया जाता है। भाषण होते हैं हिंदूवाद के और नीतियां बनती हैं अल्पसंख्यक कल्याण की। साथ ही जो वर्ग हिंदुत्व का आधार है उसे खलनायक बना दिया जाता है। औरंगजेब ने हिंदुत्व को समाप्त करने के लिए हार्डवेयर पर हमला किया था यहाँ तो हिन्दू सॉफ्टवेयर ही डिलीट करने की कोशिश चल रही है। मोहम्मद गजनवी ने मंदिरों को लुटेरो...

एक पति/पत्नी व्रती

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करवा चौथ पति-पत्नी के मध्य निष्ठा और प्रेम स्थापित करने का व्रत है। एक पति/पत्नी व्रती का परिवार प्रारम्भ से अंत तक सुखी और स्वस्थ रहता है। कुछ महिलाओं का कहना है कि हमें 40 वर्ष की उम्र में दूसरी शादी कर लेनी है तो करवा चौथ व्रत का क्या मतलब, पति की लम्बी उम्र हो या कल मर जाय इससे हमें क्या लेना-देना है। रामायण में सूर्पणखा इन्हीं महिलाओं की प्रतीक है। उसकी नाक कट गई ! ऐसी महिलाओं के दांत कम उम्र में गिर जाते हैं, बाल पक जाता है और शकल चुड़ैल सी हो जाती है। इसके अतिरिक्त, वे वृद्धावस्था में जो घोर नर्क भोगती हैं वह अवर्णीय है। कुछ अन्य महिलायें करवा चौथ को पुरुषों की गुलामी का प्रतीक मानती हैं। कुछ कहती हैं कि यह ब्राह्मणों के द्वारा बनाया हुआ ढकोसला है, पाखंड है - इसके पीछे कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। त्योहारों में इन्हें वैज्ञानिक प्रमाण चाहिए, सर के दर्द के लिए पैरों की मालिश चाहिए। पूर्वजों की बनाई हुई मान्यताओं और परम्पराओं को तुम जैसे घनचक्कर समझ सकते तो यह धरती स्वर्ग होती। हमारे सारे त्योहारों का आधार मनोविज्ञान है न कि भौतिक विज्ञान। पश्चिमी सभ्यता ने विज्ञान के चक्कर में कभ...

Karva Chauth

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  In olden days, the wives of Indian warriors used to fast and pray on the fourth day of the dark fortnight in the month of Kartik (October and November) every year for the safe return of their spouses. They called this day Karva Chauth or Karaka Chaturthi. Karwa or Karaka means a clay vase used for offering water to the deity: it refers to a religious service known as Arghya. The Chaturthi or Chauth denotes the fourth day. Married women observe a one-day fast for the long and happy lives of their husbands. Parents present their married daughters with gifts and freshly harvested grains. Celebrants paint pictures of Lord Shiva, Mata Gauri, Ganesh, the Sun, the Moon, household articles and karawa on the walls; and in front of it they decorate the floor with rangoli in advance. They take feni and milk on the eve of the festival, as a pre-dawn meal known as sargi so that they may spend the day of fasting without water. The fast begins at dawn and ends at the visibility of moon in the e...

कुत्ता तो कुत्ता होता है

  कुत्ते को उसका मालिक कितने ही डंडे मारे किन्तु घूमकर वह दरवाजे पर आता ही है। वैसे भी कोई विकल्प नहीं है, वेचारा जाए कहाँ ? हर दरवाजे पर दो-चार कुत्ते बैठे हैं। कुत्ता तो कुत्ता होता है कोई शेर तो होता नहीं है कि अपने परिवार के साथ अलग साम्राज्य बना ले। बड़ी संख्या में सियार भी तो हैं अन्दर कन्दर के इकट्ठे हो गए : हुक्काआआ....हुवाँआँआँ....! उनकी आवाज सुनकर कुछ और कुत्ते भागे और अपने मालिक के दरवाजे खड़े होकर सियारों को जवाब देने के लिए मुंह ऊपर किया और म्यूजिक कंपनी की तरह एक के बाद एक: होंओंओं...... कुत्तों का मालिक भेड़िया अब कुत्तों को नहीं सियारों को पालना चाहता है। उधर सियारों का तथाकथित नेता लकड़बग्घा उनके प्यार में इतना दीवाना है कि वह उनका मुंह चाटता है। सभी कहते हैं कि गली-गली में कुत्ते जीना तोबा किये हुए हैं किन्तु कोई यह नहीं कहता कि कुत्ते न होते तो सियार भी न होते क्योंकि लकड़बग्घे सियारों से याराना तो किये हुए हैं किन्तु अंदर ही अंदर इस ताक में हैं कि कुत्ते हटें नहीं कि वे सियारों की गर्दन धर-दबोचे। जो भी हो, गली के कुत्तों की कौन कदर करता है ! हाँ, यदि वे जंगली हो जाएँ...