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A story about the high cost of procrastination

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Literature is the richest source of entertainment as it opens the gates of unknown worlds and let you visit something surprising; music stimulates your heart and soul and thus takes you away from the world of worries; and art always leads you to the valleys of imagination where fairies, angels and deities sing and dance. These are the things that are divine, that fall on the human hearts like the rains and that are beyond the reach of human efforts. Music, art and literature make your mind healthy, refine your thoughts, keep all sorts of worries away and purify your soul, for a happy life. Wealth is necessary for a comfortable life but it alone cannot bring you all happiness and peace. Just try and see how "A Discovery of Society" brings you lasting happiness. Here is a story from the book: Don’t Dilly-Dally Summers are now not what they used to be. The welcome shade of banyan trees at noon in Baisakh and Jaisth ( the hottest months of the year ) has caught fire. The Kajari...

हिन्दी दिवस 2026

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् - बहराइच ने "साहित्य सदन" सिसई हैदर में टी. आर. मिश्र की अध्यक्षता में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करके हिन्दी दिवस मनाया। परिषद् के पूर्व अध्यक्ष शिव कुमार सिंह रैकवार मुख्य अतिथि एवं जनपद के लोकप्रिय साहित्यकार राम सँवारे द्विवेदी विशिष्ठ अतिथि थे। राम सुरत वर्मा 'जलज' ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में सरस्वती बंदना एवं बन्दे मातरम गीत गायन किया गया । किसान डिग्री कालेज के पूर्व विभागाध्यक्ष गंगोत्री प्रसाद त्रिपाठी ने हिन्दी भाषा के अंतरराष्ट्रीय विकास पर ज्ञानवर्धक जानकारी से बड़ी संख्या में उपस्थिति श्रोताओं को लाभान्वित किया। कार्यक्रम के आयोजक रमेश चन्द्र तिवारी ने कहा: "एक समय था जब लोगों को अंग्रेजी के सामने हिन्दी में बोलने पर हीन भावना महसूस हुआ करती थी किन्तु आज हिन्दी बोलने के लिए सारा विश्व लालायित है। अमेरिका में हिन्दी ने दूसरा स्थान प्राप्त कर लिया है।" राधा कृष्ण पाठक ने पढ़ा : "मैं तो एक सरल हिन्दी हूँ मेरा कोई देश नहीं। जगह जगह मैं घूमा करती मेरा कोई वेश नहीं। तुलसी और कबीर, शूर की विमल स्व...

सम्बन्ध एक आपसी निर्भरता है

इस संसार में सम्बन्ध एक आपसी निर्भरता है और कुछ नहीं। कोई भी दो व्यक्ति एक ही सोच का हो ही नहीं सकता और सोच में अंतर लगाव को कम कर देता है। अतः किसी का साथ लम्बे समय तक आत्मीय नहीं रह सकता। आत्मीयता के दूसरे पक्ष को देखें तो जब तक स्वार्थ है तब तक ही आत्मीयता जीवित रहती है। उम्र बढ़ने के साथ ही व्यक्ति उसके लिए समय निकालता है जिसे वह चाहता है और जिसको नहीं चाहता उसके लिए समय न मिलने के बहाने बनाता है। वस्तुतः सब सबका होते हुए भी कोई किसी का नहीं है।   "लोग सम्बन्ध बनाने के लिए लालाइत रहते हैं, किन्तु कोई देख न ले इससे भयभीत भी रहते हैं।" -फ्रांज काफ्का "लोग ओछा सम्बन्ध बना लेते है जिसे वे प्यार कहते हैं, जबकि अकेलेपन से धीरे-धीरे मरने लगते है।" -फ्योदोर दोस्तोवस्की माँ-बाप अपने बच्चे की बड़ी सेवा करते हैं। इस सेवा का पारितोषिक बच्चा बाल स्नेह सुख के रूप में तुरंत भुगतान कर देता है। अब उससे और अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उम्मीद उस बालक से करनी चाहिए जो जेल में पैदा हुआ था। उसी से सम्बन्ध बनाओ क्योंकि वह जन्म से लेकर मृत्यु तक का सम्बन्धी है। उसे छोड़ने का असफल प्रयास त...

मजदूर को 500 रु और बाबू को 5000 रु रोज

एक मजदूर को 500 रुपया रोज और एक बाबू को 5000 रुपया रोज : इसके अतिरिक्त मजदूर का पसीना गार लिया जाता है और बाबू ऐसी रूम में गप्पें छानकर दिन बिताता है और थोड़ा बहुत जो काम करता है उसके लिए घूस लेता है। आरक्षण की मारामारी सिर्फ इसी वजह से है न कि दलित उत्थान के लिए। बहुत से देशों में उच्चतम प्रतिभा को छोड़कर, शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम की मजदूरी लगभग सामान होती है, इसलिए वहां सभी काम सम्मानजनक माने जाते है। सामान्य जीवन यापन के लिए मजदूर को कम से कम 1500 रुपये रोज मिलना चाहिए और एक बाबू को 2000 रुपयों से अधिक नहीं मिलना चाहिए। सांसद एवं बिधायकों को भी इसी अनुपात में अपने बेतन कम करने चाहिए। यदि ऐसा हो जाय तो आरक्षण की जरूरत नहीं होगी और नागरिकों को उनके कौशल के अनुसार काम भी मिल सकेगा। जिस देश में प्रतिभा की कदर है वहां शक्ति और सम्पन्नता है और जब देश संपन्न होता है तो उसका प्रभाव सारे समाज पर पड़ता है। चीन इसका जीता जागता उदहारण है। छोटे बड़े हर औजार का अपना महत्त्व है। केवल बड़े औजार से ही नाव नहीं बनती। हमारे देश में आरी से ठोंका जाता है और हथौड़े से चीरा जाता है। जो बौद्धिक काम अच्छे से क...

मुस्लिम और आरक्षित वर्ग

  देश जबसे आजाद हुआ तबसे पूरे कांग्रेस काल तक मुस्लिम की आर्थिक और सामाजिक स्थिति उतनी ही ख़राब थी जितनी कि आरक्षित वर्ग की थी। दोनों वर्ग मजदूर हुआ करते थे। मुसलिम ने कभी मांग नहीं किया कि उसे कोई आरक्षण चाहिए। उसने छोटे-छोटे उद्योग और छोटी-छोटी कारीगरी को अपना व्यसाय बनाया और अपनी मेहनत और पुरुषार्थ पर भरोसा करके जुट गया। मोदी सरकार ने उद्योग को ऋण इत्यादि से प्रोत्साहित किया और विजली एवं सडकों की व्यवस्था ठीक की इसका लाभ उठाकर मुस्लिम समाज एकदम बूस्ट कर गया। आज हिन्दू वैश्यों से व्यापारिक प्रतियोगिता कर रहा है। पैसा होने की वजह से अच्छे-अच्छे लोग उन्हें सलाम ठोकने लगे हैं। इधर क्या हुआ समाज के उत्थान हेतु खैरात चाहिए। हमें आरक्षण की भीख दे दो हम दबे कुचले हैं। चलो भाई आरक्षण दे दिया गया और हुआ क्या जो पहले से पढ़े-लिखे सक्षम थे, जिनकी सामाजिक स्थिति पहले से सवर्णों जैसी थी उन्होंने लपक लिया और ऐसा शील कर दिया कि उसकी कोई बूँद नीचे टपक ही न सकी। दलित अभी भी दलित है। वह अपने मजदूर साथी मुस्लिम के यहां मजदूर बन गया। जब तक स्वयं से उठने की इच्छा नहीं करोगे कोई तुम्हें उठाने के लिए खाल...

सवर्ण पलायन

20वीं सदी की शुरुआत में तमिलनाडु में सवर्णों के विरुद्ध मिशनरी समर्थक पेरियार ई.वी. रामासामी के नेतृत्व में 'आत्म-सम्मान आंदोलन' शुरू हुआ और उसने सवर्णों को पलायन करने के लिए विवश कर दिया। आज वहां सवर्ण नाम की चीज नहीं बची है। कश्मीर से हिन्दू सवर्णों का पलायन 1990 में हुआ जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार थी, जिसे भारतीय जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था। इस सरकार ने मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का गृह मंत्री बना रखा था और राज्यपाल शासन लागू हो चुका था। इसी वर्ष 7 अगस्त को मंडल आयोग लागू हुआ था और सवर्ण बच्चों ने सामूहिक आत्मदाह किया था। मंडल आयोग को जनवरी 1979 में मुरारजी देसाई की बीजेपी समर्थित जनतापार्टी की सरकार ने गठित किया था। बिहार में आरक्षण समर्थित घृणा की राजनीति लालू प्रसाद ने शुरू की। परिणामस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में सवर्णों का पलायन बिहार से हुआ। वे यूपी, दिल्ली सहित देश के विभिन्न राज्यों में भागकर सेटिल हुए। कुल मिलाकर सवर्ण पलायन में जातिवादी राजनीति की भूमिका रही है। आज एक बार फिर बीजेपी जातीय घृणा उगलने लगी है क्योंकि बागडोर जिसक...

बहन बेटी करने की राजनीति

  आज तक बहन बेटी करने की राजनीति नहीं हुई थी, वह भी हो रही है। वामियों को छुट्टा कर दिया गया है जाओ सनातनियों को जी भर गाली बको, उनकी बहन, बेटी करो। बड़े-बड़े अधिकारी हों, रावण हों, कंस हों सबके मुंह गंदे हो गए हैं। पहले हिन्दू समाज इतना असभ्य नहीं था। इसके विपरीत हिन्दू धर्म की अलख जगाने वाले साधू संतों के मुंह बंद कर दिए गए हैं। मंदिरों में डकैतियां पड़ रही हैं। शराब की इतनी दुकाने खुलीं हैं कि सभी जाति वर्ग के घर उजड़ रहे हैं। औरतें वस्त्रहीन विचरण कर रही हैं जिससे लब जिहाद सरल हो गया। शिक्षा की तो धज्जी उड़ा दिया है, पढ़ो या न पढ़ो सब पास। प्राथमिक विद्यालयों में सदाचार की शिक्षा समाप्त हो गयी है। चारों ओर असभ्यता का माहौल है, गाली गलौज है। कोई नाली में लुढ़का पड़ा है, कोई मुर्गा मटन नोच रहा है। यह स्थिति पूरे हिन्दू समाज की है। सबकी अगली पीढ़ी वर्बाद हुई जा रही है। जब राजा संस्कारी होता है तब देश में संस्कार फैलता है और जब व्यभिचारी होता है तो व्यभिचार का वातावरण बनता है। जब राजा शिक्षित होता है तब देश शिक्षा के क्षेत्र में आगे होता है किन्तु जब वह अशिक्षित होता तब असभ्यता नाचने लगती है...