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ब्राह्मण

 हिन्दू समाज राजनीति से भ्रमित होकर अपने एक सशक्त भाग ब्राह्मण से वेवजह नफ़रत करता है। कहने को तो कांग्रेस ने देश को अज़्ज़ाद कराया उसने हिन्दू को और भी परतंत्र कर दिया था। हिन्दू अपने धर्म से सम्बंधित कोई भी बात सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता था। गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित राम चरित मानस ने घोर मुगलिया तूफ़ान में सनातन डीप को सुरक्षित रखा। हमारी संस्कृति को मिटा देने की अंग्रेजों की हर कोशिशें नाकाम हुई। वे ब्राह्मण थे जिन्होंने संघ जैसे संगठन को खड़ा किया। उसी संघ के ब्राह्मणों ने भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनाई जिसने सन 2014 में सत्ता राष्ट्रवादी लोगों को देकर देश को देश को वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान की। ब्राह्मण से हटकर हिन्दू सुरक्षित नहीं रह सकता और सनातन की अनुपस्थिति में किसी का जीवन जीने लायक नहीं बच सकता।   हिंदू समाज द्वारा ब्राह्मणों का तिरस्कार स्वयं के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। थोड़ी देर के लिए पूर्वाग्रह से दूर हो जाओ और सोचो, आप इस निष्कर्ष पर अवश्य आएंगे कि हिन्दू समाज को यदि कोई संगठित कर सकता है तो वह ब्राह्मण वर्ग ही है। कथा, संगीत एवं साहित्य के ...

सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा

एक देशी कहावत है : "सूत न कपास जुलाहे घर लट्ठी-लट्ठा"। कहने का अर्थ है "न नौकरी न चाकरी, परीक्षा देशव्यापी"। अरे भाई बच्चों को क्यों भरमाये घूम रहे हो?साफ-साफ बताओ न कि नौकरी नहीं है, अतः आप लोग कोई दूसरा प्रबंध सोचो। लेकिन सरकार इतना स्पष्ट तब बोल सकती है जब उसका इरादा राष्ट्र निर्माण का हो। आज की स्थिति के अनुसार पारम्परिक शिक्षा और उस पर आधारित रोजगार महत्वहीन हो चुके हैं। इसलिए सामाजिक समता के लिए केवल नौकरी और आरक्षण ही एक मात्र रास्ता नहीं है और न ही 'स्कील इंडिया' कह देने से काम चलता है। दुनिया भर के विश्वविद्यालय की जगह प्रशिक्षु कुटीर कारखाने खोले जा सकते हैं। साथ ही विपणन, बाजार निर्माण, उत्पादन तकनीकी से सम्बंधित अध्ययन एवं शोध संस्थान का विकास करके नई पीढ़ी को उद्योगी, स्वावलम्बी एवं समृद्ध बनाया जा सकता है। किन्तु सरकार बहादुर को तो "फुट डालो, खैरात बांटो और निष्कंटक राज करो" ही करना है क्योंकि यह सबसे सरल तरीका है। बताओ देश को स्वतंत्रता से क्या लाभ हुआ? जनता जानती है सरकार देश का सुधार कर रही है और सरकार बहादुर मन ही मन सोच रहे हैं : ...

फ्री का राशन एवं दक्षिणा

  प्रधानमंत्री मोदी जी अक्सर कहते हैं कि गुजरातियों की रगों में व्यापार बसता है। उनमें जरूरत भांपकर अवसरों को मुनाफे में बदलने की जन्मजात क्षमता होती है। शायद मोदी जी की इसी क्षमता ने उन्हें चुनावी प्रतियोगिता में अपराजेय बनाये रखा है। विदेशों में आपकी व्यापारिक क्षमता तो किसी ने देखा नहीं किन्तु देश में आपके व्यापार की कुशलता अत्यंत प्रशंसनीय है। आपने जनता का एक भी रुपया केवल वहीँ खर्च किया है जहां आपका कुछ न कुछ लाभ रहा है। नियम तो यह है कि जनता के टैक्स से जनता को सरकरी चिकित्सा मुफ्त में मिलनी चाहिए किन्तु यदि ऐसा किया गया तो सरकार बहादुर जानते हैं कि जनता इसे अधिकार समझेगी, अहसान नहीं। पैसा हाथ में रखने पर ही जनता समझती है कि सरकार ने उसे कुछ दिया। सरकार ने जैसे कुछ लोगों के हाथ में आयुष्मान कार्ड रखा जनता गद्गद - वह भूल गई कि प्राइवेट हॉस्पिटल उनका खून चूस रहे हैं और स्वास्थ बीमा का बाज़ार भी तैयार कर रहे हैं। जो भी हो, जनता अहसान भी मानने लगी और व्यापार भी होने लगा। वस्तुतः जनता उसे भगवान समझती है जो उनके हाथ में फ्री का राशन एवं कुछ दक्षिणा देता है, जबकि वह भगवान् जिसकी वास्...

महान सर जी

विधायिका प्रजातंत्र का पहला स्तम्भ है। दूसरा महत्वपूर्ण स्तम्भ कार्यपालिका है। तीसरे पर न्यायपालिका आती है और चौथा और अंतिम स्तम्भ प्रेस या मीडिया को माना गया। इनमें कार्यरत लगभग सभी का उद्देश्य आज राष्ट्र निर्माण नहीं बल्कि अधिकतम धन को सोखना है। धन सोखने के चक्कर में प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ तो कब का नहीं गिर गया है। तीसरे स्तम्भ की बात करें तो धन के भार ने उसे आधा झुका दिया है। शेष दो खम्भे इतने मोठे हैं कि उनमें सारी अर्थव्यवस्था समा सकती है। 'पैसा फेको और भजन कराओ' के धंधे से जब मिडिया की टीआरपी गिरी तो सर जी लोगों ने मौके का फायदा उठा लिया और उन्हें हैक करने लगे। अपने धंधे की जमीन खिसकते देख मिडिया सर जी पर उखड़ पडी। अब सरजी और मिडिया की तू-तू-मैं-मैं से एक दूसरे की पोल खुलने लगी। सर जी लोगों का उद्देश्य कोई देश को शिक्षित करने का नहीं है, नहीं तो वे सबको इंजिनियर, डाक्टर, कलेक्टर बनाने के बजाय मिस्तरी, कारीगर, उद्योगी या उत्पादक भी बना रहे होते। उनके पढ़ाने से नहीं बल्कि उनकी सेटिंग से उनके बच्चे प्रतियोगी परीक्षा पास होते है। बस यहीं छोटी पूंजी वाले गुरूजी लोगों का धंधा...

पुण्यश्लोका माता अहिल्याबाई होल्कर

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  अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर (वर्तमान में अहिल्यानगर) के 'चौंडी' गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था । 1733 में आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह मालवा के सूबेदार मल्हारराव होल्कर के पुत्र खांडेराव होल्कर के साथ हुआ था। 1754 में कुम्हेर के युद्ध में उनके पति वीरगति को प्राप्त हुए। पति की मृत्यु के बाद सती होने की इच्छा जताने पर, उनके ससुर मल्हारराव ने उन्हें रोक लिया और प्रशासनिक व सैन्य प्रशिक्षण दिया । 1766 में ससुर मल्हारराव के निधन और बाद में अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु के बाद, 1767 में उन्होंने मालवा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली। उन्होंने अपनी राजधानी को इंदौर से स्थानांतरित कर नर्मदा नदी के किनारे बसे महेश्वर में स्थापित किया। उन्होंने देश भर में 1000 से अधिक मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) का पुनर्निर्माण उन्हीं के द्वारा 1780 में करवाया गया था। इसके अलावा अयोध्या, मथुरा, सोमनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ और रामेश्वरम जैसे प्रमुख तीर्थों में भी उन्होंने भव्य निर्माण कार्य करवाए।...

नौटंकी से जनता फुसलाई जा सकती है - देश नहीं चलता

  हिन्दूवाद के दरवाजे से अटल और आडवाणी जी ने सत्ता में प्रवेश किया था। पाकिस्तान प्यार की खिड़की से अटल जी अपने गुड फील के साथ बाहर निकल गए और जिन्ना मोह की सुरंग से आडवाणी जी। अब आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने बयान दिया है कि हमें पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। इसका समर्थन करते हुए सम्बद्ध संगठन वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा कि पाकिस्तान के लोग अंततः अपने इतिहास को समझेंगे और भारत में अपने ‘पूर्वजों की जड़ों और परंपराओं’ की ओर लौटेंगे। यदि ज़रा भी इतिहास और बायलॉजी का ज्ञान हो तो सोचो अखंड भारत का मुस्लिम सभी कन्वर्टेड नहीं है बल्कि अधिकतर अनुवांशिक है। सोचो क्या संभव है कि तालाब का पानी ऊपर चढ़कर झरने से मिलने आ जाय? निश्चित ही नहीं, फिर यदि झरने का पानी बहकर तालाब में मिलेगा तब क्या वह तालाब के पानी को साफ़ करेगा या स्वयं अपनी स्वच्छता को खो देगा? विदेशी टिप्पड़ियों से भयभीत होकर अपने सिद्धांतों से क्यों समझौता कर रहे हो भाई। हमारी कमी सदैव यही रही है कि विवाद से बचने के लिए हम अपने ही बच्चे को दोषी कहकर उसे थप्पड़ जड़ देते हैं। बीजेप...

आंधी-तूफ़ान के पहले असहनीय उमस का मौसम

  भारतीय समाज बहुत तेजी से संक्रमित हो रहा है। गाली, अभद्रता युक्त मस्खरी सोसल मीडिया पर अत्यंत लोकप्रिय हो रही है। नयी पीढ़ी में अनुशासन तो भूल जाओ। बच्चों में न माँ-बाप का डर है न ही शिक्षकों का। इसका दोषी आज की शिक्षा पद्यति है क्योंकि पाठ्यक्रमों मे नैतिक शिक्षा केवल औपचारिकता है। इसमें समाज भी उतना ही दोषी है क्योंकि भौतिकता के इस युग में मानव को पैसों के आगे सदाचार एवं शिष्टाचार बकवास की चीज लगती है। पेशेवर-नैतिकता के अभाव में आकंठ भ्रष्टाचार है। एक समय था जब लोग पुस्तक को विद्या देवी का स्वरुप मानते थे। आज बच्चों में पुस्तक पढ़ने का धैर्य समाप्त हो चुका है। पढ़ना तो छोड़ो कोई पुस्तक देखना नहीं चाहता। परिणाम यह हुआ कि लोगों में मानव जीवन से सम्बंधित गंभीर जानकारी शून्य हो रही है। युवा किसी व्यसन, किसी आदत, किसी आचरण के परिणाम से अनभिज्ञ हो रहे हैं। सभ्य जीवन की परिभाषा मांस मदिरा बन गया है। राजनीति में मानव मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। समाज इतना व्यभिचारी हो गया है कि वह पशु से भी गिरा गुजरा बन गया है। ब्राह्मण के प्रति उसकी शिक्षा पर आश्रित जनसमूह में घृणा की राजनीति भा...