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बहन बेटी करने की राजनीति

  आज तक बहन बेटी करने की राजनीति नहीं हुई थी, वह भी हो रही है। वामियों को छुट्टा कर दिया गया है जाओ सनातनियों को जी भर गाली बको, उनकी बहन, बेटी करो। बड़े-बड़े अधिकारी हों, रावण हों, कंस हों सबके मुंह गंदे हो गए हैं। पहले हिन्दू समाज इतना असभ्य नहीं था। इसके विपरीत हिन्दू धर्म की अलख जगाने वाले साधू संतों के मुंह बंद कर दिए गए हैं। मंदिरों में डकैतियां पड़ रही हैं। शराब की इतनी दुकाने खुलीं हैं कि सभी जाति वर्ग के घर उजड़ रहे हैं। औरतें वस्त्रहीन विचरण कर रही हैं जिससे लब जिहाद सरल हो गया। शिक्षा की तो धज्जी उड़ा दिया है, पढ़ो या न पढ़ो सब पास। प्राथमिक विद्यालयों में सदाचार की शिक्षा समाप्त हो गयी है। चारों ओर असभ्यता का माहौल है, गाली गलौज है। कोई नाली में लुढ़का पड़ा है, कोई मुर्गा मटन नोच रहा है। यह स्थिति पूरे हिन्दू समाज की है। सबकी अगली पीढ़ी वर्बाद हुई जा रही है। जब राजा संस्कारी होता है तब देश में संस्कार फैलता है और जब व्यभिचारी होता है तो व्यभिचार का वातावरण बनता है। जब राजा शिक्षित होता है तब देश शिक्षा के क्षेत्र में आगे होता है किन्तु जब वह अशिक्षित होता तब असभ्यता नाचने लगती है...

भेड़ों के ग्राहक होते हैं शेरों के नहीं

 मीडिया ईरान, अमेरिका, यूक्रेन, रूस, चीन गई है। विद्वान प्रवक्ता दुनिया देख रहे हैं जन्तर-मन्तर नहीं। पक्ष-विपक्ष पार्टियां सभी काकरोचों को पालने में लगे हैं, गरुण को नहीं - अदाकारों, भेड़ों के ग्राहक होते हैं शेरों के नहीं ! आज सभी पार्टियों के लिए जंतरमंतर किष्किंधा है। आँख के अंधों, किष्किंधा में राम आएंगे और तुम अपने को बालि समझते हो, तुम सभी को ढेर होना ही है। आरक्षण के नाम पर सरकार का विरोध किया नहीं कि मेढक टों टों करके कांग्रेसी कहने लगते हैं। गुलामी के पौधों, आज बीजेपी भी कांग्रेस ही है, सभी पार्टियां कांग्रेस हैं और हम सभी का वहिष्कार करते हैं। देश की खिचड़ी आबादी में रामभक्तों का दम घुट रहा है - हमें अलग राष्ट्र चाहिए। मेढक कहे कि कोयल ने मुझे संगीत सीखने नहीं दिया तो क्या इसमें कोयल की कोई गलती है? बेर कहे कि ताड़ ने मुझे बड़ा होने नहीं दिया तो क्या ताड़ ने उन्हें रोका था? आरक्षण प्रेमियों, तुम्हारा विकास कभी नहीं हो सकता। जिस दिन नौकरी चली गई उस दिन तुम फिर जैसे थे वैसे हो जाओगे। कारण प्रमुख रूप से दो हैं : पहला तो तुम लोग राम द्रोही हो और दूसरा तुम्हारी सोच में पुरुषार्थ क...

अनुसूचित बच्चों की शिक्षा ही नहीं पालन पोषण

  अनुसूचित जनजातियां अधिकतर जंगलों में रहने वाले लोग हैं वे विकासशील सभ्यता में शामिल नहीं हो सके। अतः आरक्षण उनके लिए अति आवश्यक है। अनुसूचित जाति में सैकड़ों जातियां हैं वे मुख्य रूप से गावों में मजदूरी और शहरों में सफाई कार्य करते थे। अधिकतर लोग आज भी वही कर रहे हैं। चूंकि ये लोग ऐसे व्यवसाय में रहे हैं जहां इनकी खुद की सोच कभी विकसित हुई ही नहीं इसलिए इन्हें आरक्षण चाहिए। अब यह स्पष्ट हो गया कि इन्हें आरक्षण मिलना चाहिए किन्तु जिसने हवाई जहाज कभी देखा ही न हो उसे पायलेट बना दो तो क्या हवाई जहाज उड़ेगा? अतः आरक्षण देने से पहले इन्हें हुनरमंद अथवा शिक्षित करने की आवश्यकता है। क्या मजदूरों, वनवासियों या सफाई कर्मियों के बच्चो को शिक्षा के लिए समुचित प्रयास किये गए ? यदि शिक्षित किये गए होते तो मजदूरों के बच्चे आज भी मजदूर नहीं बन रहे होते। अब बताओ आरक्षण को लागू हुए आठ दशक होने वाले हैं तो अब तक आरक्षण का लाभ फिर किसे मिल रहा है? उत्तर मिलेगा कि उन लोगों को जो जाति से तो अनुसूचित थे किंतु वे पहले से ही सामान्य वर्ग के समानांतर शिक्षित व् सम्पन्न जीवन जी रहे थे। कोई भी वर्ग कितना ही ...

अबकी बार 400 पार

  2024 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी यह कह कर चूक गई कि 'अबकी बार 400 पार'। विपक्षी दलों ने इसका फायदा उठाया और प्रचारित कर दिया कि बाबा साहब के संविधान को बीजेपी बदल देना चाहती है। इस दूध से बिल्ली इस तरह से जली कि उसके दिमाक की गहराई में बैठ गया कि केवल दलित वोट से ही चुनाव जीते जा सकते हैं। फिर क्या था सरकार बहादुर को दलित वर्ग चाहिए चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उन्होंने अपने समर्पित वोटरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की और उनकी कीमत पर यूजीसी 2026 लाकर पटक दिया। सिद्धांत यह कहता है कि यदि किसी एक चीज का नुकसान हो गया हो तो उसको ठीक करने के लिए दूसरे मूल्यवान चीज को दांव पर नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ऐसे में दोनों हाथ से निकल सकते हैं। माहौल अब कुछ इसी तरह बन चुका है। लगता है सवर्ण अब कोई विकल्प खोज लेगा और दलित अपनी अगली पीढ़ी की वेरोजगारी से दुखी होकर पुरानी डाल पर लौटना पसंद करेगा। इसके अतिरिक्त एक और विषय है जिसे सरकार बहादुर को सोचना चाहिए। गहरे जातिवाद के आधार पर किसी एक प्रांत का चुनाव जीता जा सकता है किन्तु केंद्रीय सत्ता सभी वर्गों के वोटों से प्राप्त होती है जैसे ब...

Raksha Bandhan 2026

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  Rakshabandhan is celebrated on Shravana Poornima, the full moon day in the Lunar month of Shravan, which typically occurs in July or August on Gregorian calendar. On this day, sisters tie an amulet called rakhi around the wrists of their brothers as a symbol of the bond of protection and obligation. Sanatan culture defines every relationship as a divine bond between members of a family, which ultimately generates a sense of having natural obligations to each other and makes the family live comfortably. A father loves his son and daughter and brings them up, so does a mother; but the relationship between a brother and his sister is such that involves deep feelings and self-sacrificing attributes. A sister cares for her brother and a brother can do anything to protect his sister. This festival is also known as Shravani in Uttarakhand and in Maharashtra as Nariyal Poornima. South Indian Brahmins call it Avani Avittam. This day is very important for Brahmins as they perform Upakram –...

हिन्दू एकता का आधार ब्राह्मण

जैसे आँख दुनिया को देखती है किन्तु स्वयं को नहीं देख सकती, उसी तरह ब्राह्मण स्वयं कभी एक नहीं हो सका किन्तु यदि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एकता के सूत्र में किसी ने पिरोये रखा है तो वह ब्राह्मण है। घने जंगलों में आदिवासियों का जीवन प्राचीन हिन्दू संस्कृति पर आधारित है। आदिवासी समुदाय भी सूर्य, चंद्र, नदियों, पर्वतों और पेड़ों की पूजा करते हैं। कई स्थानों पर वे लोग भगवान शिव, राम जी या हनुमान जी जैसे देवी-देवताओं की भी पूजा करते हैं। इन्हें सनातन संस्कृति यदि ब्राह्मण ने नहीं दिया है तो फिर किसने दिया है? आदिगुरु शकराचार्य ने ही सनातन की पुनर्स्थापना की थी। आचार्य चाणक्य ने सिकंदर के विरुद्ध अखण्ड भारत की स्थापना की। उन्होंने नन्द साम्राज्य सहित सभी छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त करके विशाल मौर्य साम्राज्य का निर्माण किया। देश भर की अनुसूचित जातियां सनातन मान्यताओं में गहरी आस्था रखतीं हैं। ओबीसी और सवर्ण की तो बात ही छोडो। मुग़ल शासन काल में महाराज तुलसीदास ने राम चरित मानस की रचना करके सनातन को संरक्षित रखा। आदिकाल से अब तक सारे समाज को भागवत कथा, रीति रिवाज, उत्सव, महोत्सव, तीर्थ, व्रत आदि ...

आरक्षण हटाओ आन्दोलन

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आरक्षण संशोधन की मांग को लेकर आज सवर्ण समाज जन्तर-मन्तर पर इकठ्ठा हो गया है। एक भारी भीड़ वहां पहुंच रही है और पुलिस बैरिकेटिंग लगाकर उन्हें शामिल होने से रोक रही है। इतना ही नहीं सारी मीडिया इस सम्बन्ध में कोई खबर नहीं चला रही है। सारा कुछ केवल सोसल मीडिया पर चल रहा है। सरकार ने इन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए परमिशन भी नहीं दिया है यद्यपि परमिशन की आवश्यकता भी नहीं होती केवल सूचना देना ही पर्याप्त होता है ताकि सरकार उनके लिए आवश्यक सामाग्री मुहैया कराये। यहाँ भोजन पानी की व्यवस्था तो छोड़ो सरकार ने उनके लिए लट्ठ की व्यवस्था करके रखी है।   अतिउत्साह में सरकार बहादुर ने अपने पैरों पर उस दिन कुल्हाड़ी मारी थी जिस दिन यूजीसी लागू किया था। उन्होंने बड़े भावुक ढंग से कहा था "गोली मारनी है तो मुझे मारो मेरे दलित भाइयों को क्यों मार रहे हो, समाज की एकता को क्यों नष्ट कर रहे हो!" उसके बाद दलितों पर पैलेट गन चल जाते हैं। उन पर क्रूरता की हद हो जाती है। सरेआम झूठ बोलना है साहब को। सवर्ण बेचारा दलितों से पहले ही भयभीत है कि कहीं एससी/एसटी धारा न लग जाय, वह उनकी गाली खाता है, फिर भी उन्हे...