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मजदूर को 500 रु और बाबू को 5000 रु रोज

एक मजदूर को 500 रुपया रोज और एक बाबू को 5000 रुपया रोज : इसके अतिरिक्त मजदूर का पसीना गार लिया जाता है और बाबू ऐसी रूम में गप्पें छानकर दिन बिताता है और थोड़ा बहुत जो काम करता है उसके लिए घूस लेता है। आरक्षण की मारामारी सिर्फ इसी वजह से है न कि दलित उत्थान के लिए। बहुत से देशों में उच्चतम प्रतिभा को छोड़कर, शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम की मजदूरी लगभग सामान होती है, इसलिए वहां सभी काम सम्मानजनक माने जाते है। सामान्य जीवन यापन के लिए मजदूर को कम से कम 1500 रुपये रोज मिलना चाहिए और एक बाबू को 2000 रुपयों से अधिक नहीं मिलना चाहिए। सांसद एवं बिधायकों को भी इसी अनुपात में अपने बेतन कम करने चाहिए। यदि ऐसा हो जाय तो आरक्षण की जरूरत नहीं होगी और नागरिकों को उनके कौशल के अनुसार काम भी मिल सकेगा। जिस देश में प्रतिभा की कदर है वहां शक्ति और सम्पन्नता है और जब देश संपन्न होता है तो उसका प्रभाव सारे समाज पर पड़ता है। चीन इसका जीता जागता उदहारण है। छोटे बड़े हर औजार का अपना महत्त्व है। केवल बड़े औजार से ही नाव नहीं बनती। हमारे देश में आरी से ठोंका जाता है और हथौड़े से चीरा जाता है। जो बौद्धिक काम अच्छे से क...

मुस्लिम और आरक्षित वर्ग

  देश जबसे आजाद हुआ तबसे पूरे कांग्रेस काल तक मुस्लिम की आर्थिक और सामाजिक स्थिति उतनी ही ख़राब थी जितनी कि आरक्षित वर्ग की थी। दोनों वर्ग मजदूर हुआ करते थे। मुसलिम ने कभी मांग नहीं किया कि उसे कोई आरक्षण चाहिए। उसने छोटे-छोटे उद्योग और छोटी-छोटी कारीगरी को अपना व्यसाय बनाया और अपनी मेहनत और पुरुषार्थ पर भरोसा करके जुट गया। मोदी सरकार ने उद्योग को ऋण इत्यादि से प्रोत्साहित किया और विजली एवं सडकों की व्यवस्था ठीक की इसका लाभ उठाकर मुस्लिम समाज एकदम बूस्ट कर गया। आज हिन्दू वैश्यों से व्यापारिक प्रतियोगिता कर रहा है। पैसा होने की वजह से अच्छे-अच्छे लोग उन्हें सलाम ठोकने लगे हैं। इधर क्या हुआ समाज के उत्थान हेतु खैरात चाहिए। हमें आरक्षण की भीख दे दो हम दबे कुचले हैं। चलो भाई आरक्षण दे दिया गया और हुआ क्या जो पहले से पढ़े-लिखे सक्षम थे, जिनकी सामाजिक स्थिति पहले से सवर्णों जैसी थी उन्होंने लपक लिया और ऐसा शील कर दिया कि उसकी कोई बूँद नीचे टपक ही न सकी। दलित अभी भी दलित है। वह अपने मजदूर साथी मुस्लिम के यहां मजदूर बन गया। जब तक स्वयं से उठने की इच्छा नहीं करोगे कोई तुम्हें उठाने के लिए खाल...

सवर्ण पलायन

20वीं सदी की शुरुआत में तमिलनाडु में सवर्णों के विरुद्ध मिशनरी समर्थक पेरियार ई.वी. रामासामी के नेतृत्व में 'आत्म-सम्मान आंदोलन' शुरू हुआ और उसने सवर्णों को पलायन करने के लिए विवश कर दिया। आज वहां सवर्ण नाम की चीज नहीं बची है। कश्मीर से हिन्दू सवर्णों का पलायन 1990 में हुआ जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार थी, जिसे भारतीय जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था। इस सरकार ने मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का गृह मंत्री बना रखा था और राज्यपाल शासन लागू हो चुका था। इसी वर्ष 7 अगस्त को मंडल आयोग लागू हुआ था और सवर्ण बच्चों ने सामूहिक आत्मदाह किया था। मंडल आयोग को जनवरी 1979 में मुरारजी देसाई की बीजेपी समर्थित जनतापार्टी की सरकार ने गठित किया था। बिहार में आरक्षण समर्थित घृणा की राजनीति लालू प्रसाद ने शुरू की। परिणामस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में सवर्णों का पलायन बिहार से हुआ। वे यूपी, दिल्ली सहित देश के विभिन्न राज्यों में भागकर सेटिल हुए। कुल मिलाकर सवर्ण पलायन में जातिवादी राजनीति की भूमिका रही है। आज एक बार फिर बीजेपी जातीय घृणा उगलने लगी है क्योंकि बागडोर जिसक...

बहन बेटी करने की राजनीति

  आज तक बहन बेटी करने की राजनीति नहीं हुई थी, वह भी हो रही है। वामियों को छुट्टा कर दिया गया है जाओ सनातनियों को जी भर गाली बको, उनकी बहन, बेटी करो। बड़े-बड़े अधिकारी हों, रावण हों, कंस हों सबके मुंह गंदे हो गए हैं। पहले हिन्दू समाज इतना असभ्य नहीं था। इसके विपरीत हिन्दू धर्म की अलख जगाने वाले साधू संतों के मुंह बंद कर दिए गए हैं। मंदिरों में डकैतियां पड़ रही हैं। शराब की इतनी दुकाने खुलीं हैं कि सभी जाति वर्ग के घर उजड़ रहे हैं। औरतें वस्त्रहीन विचरण कर रही हैं जिससे लब जिहाद सरल हो गया। शिक्षा की तो धज्जी उड़ा दिया है, पढ़ो या न पढ़ो सब पास। प्राथमिक विद्यालयों में सदाचार की शिक्षा समाप्त हो गयी है। चारों ओर असभ्यता का माहौल है, गाली गलौज है। कोई नाली में लुढ़का पड़ा है, कोई मुर्गा मटन नोच रहा है। यह स्थिति पूरे हिन्दू समाज की है। सबकी अगली पीढ़ी वर्बाद हुई जा रही है। जब राजा संस्कारी होता है तब देश में संस्कार फैलता है और जब व्यभिचारी होता है तो व्यभिचार का वातावरण बनता है। जब राजा शिक्षित होता है तब देश शिक्षा के क्षेत्र में आगे होता है किन्तु जब वह अशिक्षित होता तब असभ्यता नाचने लगती है...

भेड़ों के ग्राहक होते हैं शेरों के नहीं

 मीडिया ईरान, अमेरिका, यूक्रेन, रूस, चीन गई है। विद्वान प्रवक्ता दुनिया देख रहे हैं जन्तर-मन्तर नहीं। पक्ष-विपक्ष पार्टियां सभी काकरोचों को पालने में लगे हैं, गरुण को नहीं - अदाकारों, भेड़ों के ग्राहक होते हैं शेरों के नहीं ! आज सभी पार्टियों के लिए जंतरमंतर किष्किंधा है। आँख के अंधों, किष्किंधा में राम आएंगे और तुम अपने को बालि समझते हो, तुम सभी को ढेर होना ही है। आरक्षण के नाम पर सरकार का विरोध किया नहीं कि मेढक टों टों करके कांग्रेसी कहने लगते हैं। गुलामी के पौधों, आज बीजेपी भी कांग्रेस ही है, सभी पार्टियां कांग्रेस हैं और हम सभी का वहिष्कार करते हैं। देश की खिचड़ी आबादी में रामभक्तों का दम घुट रहा है - हमें अलग राष्ट्र चाहिए। मेढक कहे कि कोयल ने मुझे संगीत सीखने नहीं दिया तो क्या इसमें कोयल की कोई गलती है? बेर कहे कि ताड़ ने मुझे बड़ा होने नहीं दिया तो क्या ताड़ ने उन्हें रोका था? आरक्षण प्रेमियों, तुम्हारा विकास कभी नहीं हो सकता। जिस दिन नौकरी चली गई उस दिन तुम फिर जैसे थे वैसे हो जाओगे। कारण प्रमुख रूप से दो हैं : पहला तो तुम लोग राम द्रोही हो और दूसरा तुम्हारी सोच में पुरुषार्थ क...

अनुसूचित बच्चों की शिक्षा ही नहीं पालन पोषण

  अनुसूचित जनजातियां अधिकतर जंगलों में रहने वाले लोग हैं वे विकासशील सभ्यता में शामिल नहीं हो सके। अतः आरक्षण उनके लिए अति आवश्यक है। अनुसूचित जाति में सैकड़ों जातियां हैं वे मुख्य रूप से गावों में मजदूरी और शहरों में सफाई कार्य करते थे। अधिकतर लोग आज भी वही कर रहे हैं। चूंकि ये लोग ऐसे व्यवसाय में रहे हैं जहां इनकी खुद की सोच कभी विकसित हुई ही नहीं इसलिए इन्हें आरक्षण चाहिए। अब यह स्पष्ट हो गया कि इन्हें आरक्षण मिलना चाहिए किन्तु जिसने हवाई जहाज कभी देखा ही न हो उसे पायलेट बना दो तो क्या हवाई जहाज उड़ेगा? अतः आरक्षण देने से पहले इन्हें हुनरमंद अथवा शिक्षित करने की आवश्यकता है। क्या मजदूरों, वनवासियों या सफाई कर्मियों के बच्चो को शिक्षा के लिए समुचित प्रयास किये गए ? यदि शिक्षित किये गए होते तो मजदूरों के बच्चे आज भी मजदूर नहीं बन रहे होते। अब बताओ आरक्षण को लागू हुए आठ दशक होने वाले हैं तो अब तक आरक्षण का लाभ फिर किसे मिल रहा है? उत्तर मिलेगा कि उन लोगों को जो जाति से तो अनुसूचित थे किंतु वे पहले से ही सामान्य वर्ग के समानांतर शिक्षित व् सम्पन्न जीवन जी रहे थे। कोई भी वर्ग कितना ही ...

अबकी बार 400 पार

  2024 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी यह कह कर चूक गई कि 'अबकी बार 400 पार'। विपक्षी दलों ने इसका फायदा उठाया और प्रचारित कर दिया कि बाबा साहब के संविधान को बीजेपी बदल देना चाहती है। इस दूध से बिल्ली इस तरह से जली कि उसके दिमाक की गहराई में बैठ गया कि केवल दलित वोट से ही चुनाव जीते जा सकते हैं। फिर क्या था सरकार बहादुर को दलित वर्ग चाहिए चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उन्होंने अपने समर्पित वोटरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की और उनकी कीमत पर यूजीसी 2026 लाकर पटक दिया। सिद्धांत यह कहता है कि यदि किसी एक चीज का नुकसान हो गया हो तो उसको ठीक करने के लिए दूसरे मूल्यवान चीज को दांव पर नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ऐसे में दोनों हाथ से निकल सकते हैं। माहौल अब कुछ इसी तरह बन चुका है। लगता है सवर्ण अब कोई विकल्प खोज लेगा और दलित अपनी अगली पीढ़ी की वेरोजगारी से दुखी होकर पुरानी डाल पर लौटना पसंद करेगा। इसके अतिरिक्त एक और विषय है जिसे सरकार बहादुर को सोचना चाहिए। गहरे जातिवाद के आधार पर किसी एक प्रांत का चुनाव जीता जा सकता है किन्तु केंद्रीय सत्ता सभी वर्गों के वोटों से प्राप्त होती है जैसे ब...