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बाहर नहीं युद्ध घर में कराया

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  एक शेर जंगल से इस तरह भाग रहा था जैसे मौत उसके पीछे पडी हो। माइक लेकर लोमड़ी दौड़ी और पूछा,"शेर भाई क्या हो गया? शेर ने हांफते-हांफते कहा, "मेरे पीछे एक भयानक महिला पड़ गई है। मौत में इज्जत मर्यादा तो फिर भी बची रहती है।" तभी एक तेंदुआ भागते दिखा। लोमड़ी उसके पास भी पहुंची और वही सवाल किया। तेंदुवा बोला, " एक पडोसी तेंदुवा जब मुझसे जीत नहीं सका तो मदद के लिए एक एससी भाई के पास चला गया।" इतना कहते हुए वह रोने लगा। इतने में सभी शेर, बाघ, तेंदुआ, चीते इकट्ठे होकर जो चिल्लाने लगे। लोमड़ी दौड़ी और पूछा अब क्या हो गया? एक शेर आगे आता है और माइक पकड़ता है : "जंगल के राजा ने जंगल के बाकी सभी नागरिकों को बन्दूक पकड़ा दिया है और उनसे कहा है जहां भी शेर, चीते या उनके बच्चे दिखें उन्हें खोज-खोज कर मारो।" हमारे चारों और इतने भाले, इतने कांटे बिछा दिए हैं सरकार ने कि जीना तोबा हो गया है। आरक्षित समाज के एक प्रतिशत लोगों को शायद ही आरक्षण का लाभ इन 77 वर्षों में मिल सका होगा किन्तु इसका नशा व्यापक हैं? मुगलों, अंग्रेजों ने तो प्यार किया था - सारा अत्याचार केवल सवर्णों ने ...

व्यक्तिगत विवाद

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  एक समय था जब लोग बड़े सम्मान से कहते थे "ठाकुर साहब" "पण्डित जी"। आज दोनों उपाधियाँ जैसे गाली बन गई हों। अंग्रेज बूट की ठोकर लगा कर कहते थे "इंडियन डॉग", मुग़ल तिरस्कार से कहते थे "काफिर"। किन्तु ये तो मालिक थे इनके द्वारा किये गए अपमान को भूल जाना चाहिए। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के लिए प्रचार करना पड़ता है "मैं पिछड़ा हूँ, मैं दलित हूँ"। जब आप अपने को पिछड़ा या दलित कहने में गर्व करते हो तो समरसता के लिए कम से कम हमें भी साहब या जी को हटाकर ही कहने दो मैं ठाकुर हूँ या पंडित हूँ। सामने वाला कहता है, "कौन सी जाति की हो ? गर्मी दूर कर दूंगा !" इसमें घोर अहंकार है ! फिर भी इस अहंकार को बुरा नहीं माना जाएगा ! अहंकार तो तब हुआ जब आस्था सिंह ने जवाब में अपना जाति बता दिया। 6 जनवरी की घटना 6 फरवरी के बाद वाइरल की जा रही है। दो सामान जातियों के लोगों ने गुस्से में एक दूसरे को गर्मी दिखाई और बिना किसी को नुक्सान किये शांत हो गए। इसका उद्देश्य निश्चित राजनीतिक है जिसके माध्यम से यह प्रचार करना है कि ठाकुर में अहंकार है । जबकि राजनीत...

एआई

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  जिस तरह कृषि उपकरण ने देशी पशुओं को आवारा कर दिया है, सामान्य जनमानस को उसी तरह एआई आवारा करने वाला है। सकल घरेलू उत्पाद का 50 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा सेवा क्षेत्र है, एआई मुख्य रूप से उसे ही टारगेट करने वाला है। पारम्परिक नौकरियाँ तो समाप्त ही होंगी, आईटी सेक्टर की नौकरियों को भी यह खा जाएगा। खैर ये तो दूर की बात हुई, नौकरियों के नाम पर सरकार की भी नीयत अच्छी नहीं रही है। एक आधार कार्ड में संशोधन आज के दिन तारे तोड़ने जैसा कार्य है और एक नया आधार कार्ड बनवाना तो इस पृथ्वी का सबसे कठिन कार्य हो गया है। यदि आधार एक आवश्यक कार्ड है तो सरकार आधार विभाग की सरकारी शाखाएं देश भर में क्यों नहीं खोलती जिसमें लाखों युवकों को रोजगार तो मिलेगा ही साथ ही जनता को भी सुविधा होगी। आज सरकार को जानने की जरूरत है कि राज तंत्र कोई बहुत मजबूत चीज नहीं है। यदि बड़ी संख्या में युवक वेरोजगार हो गए तो बांटो और राज करो से काम नहीं चलेगा - सारा तंत्र ध्वस्त हो जाएगा। पकिस्तान का राजतंत्र विगड़ चुका है। श्रीलंका और नेपाल में तो कोई तंत्र ही नहीं है। भारत सरकार को सावधान होना चाहिए। मॉस में युवक वेरोजगार हों...

सवर्ण

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यूजीसी कानून का विरोध करने वाला सवर्ण आखिर जाएगा कहाँ जब देश की हर पार्टी इस कानून की समर्थक है? इस प्रश्न का उत्तर है किसी के पास ? मेरे पास है तो सुनों। पेड़ों में जब बसन्त आना होता है तो पतझड़ आता है। बंटवारे के समय पकिस्तान से पलायन किये हुए सिंधी आज सभी अरबपति हैं और हिन्दुस्तानी मूल के लोगों को नौकर रखे हुए हैं। बिहार और तमिनाडु से बहुत बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग पलायन कर चुका है। सामान्य वर्ग पर जब अत्याचार बढ़ेगा तो प्राकृतिक रूप से जहां वे अधिक होंगे सुरक्षा के कारण वहीँ इकट्ठे होने लगेंगे और जब बड़ी संख्या में एकत्रित हो जाएंगे तो उन्हें स्वयं का तंत्र विकिसित करना सरल हो जाएगा। सवर्ण के समाज में जाति हटा दी जाएगी - वहां न कोई ब्राह्मण होगा न वैश्य न क्षत्री सभी सनातनी होंगे। भूसा नहीं सिर्फ गेहूं होगा। भेड़ों के झुण्ड नहीं शेरों के परिवार होंगे। सबको अपने राष्ट्र से प्यार होगा। सम्मुख अत्याचारी, ईर्ष्यालु समाज के सापेक्ष आपस में प्रेम होगा, संघर्ष करने की प्रेरणा होगी। वहां उसके अपने शिक्षा संस्थान होंगे, अपनी सरकार होगी। उनकी आबादी बड़ी तेजी से व्यापार करेगी और पैसा होने से उत्त...

अयोग्य शिक्षक ही देश को पूरी तरह समाप्त कर सकता है

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किसी देश को युद्ध से पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। यदि उसे समूल नष्ट कर देना है तो एक मात्र और सबसे सरल तरीका है कि उसकी शिक्षा भ्रष्ट कर दो। शिक्षा का स्तर गिरने से बड़ी संख्या में लोगों को डाक्टर ही मार देंगे, इंजिनियर पुल-बिल्डिंग बनाएंगे कुछ उसमें दबकर मर जाएंगे। अर्थशास्त्री देश को भूखों मार देंगे। नौकरशाह गृहयुद्ध पैदा कर देंगे और एक साथ ये सारी तबाही लाने में अयोग्य शिक्षकों का समूह अकेले ही काफी होगा। एक गुजराती ने हिन्दू राष्ट्र बनने नहीं दिया था। आज दो गुजराती हैं, पूरी वर्वादी के सरल तरीके को वे ही खोज सके हैं। खैर, भोजन, कपड़ा और मकान के वगैर जीवन नहीं चल सकता। उसी तरह संघर्षों से बचकर जीवित नहीं रहा जा सकता। देश या हिन्दू समाज द्रोहियों से संघर्ष स्वतंत्रता संग्राम की तरह अनिवार्य हो गया है। साथ में अब हमारा यह भी कर्तव्य है कि अपने छोटे भाइयों को द्रोहियों के झांसे से बचाएं। उन्हें समझाएं कि देश से अधिक सत्ता के लोभी हमारे खिलाफ मुस्लिमों को भी ललकार सकते हैं। उन्हें समझाएं कि वे हमसे ईर्ष्या न करें क्योंकि हमसे संचालित मंदिरों की आय में उनका भी हिस्सा है, हमारे व्य...

विश्व विद्यालय अनुदान आयोग विनियम 2026

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विश्व विद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम 2026 केवल धर्म, नस्ल , लिंग, जन्म स्थान, जाति या अपंगता के आधार पर विशेष तौर पर एससी/एसटी, सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग, गरीब, विकलांग के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करना कानून का उद्देश्य है। हर विद्यालय या विश्वविद्यालय में सामान अवसर केंद्र स्थापित होगा। यह केंद्र नजर रखेगा कि वंचितों का लाभ उन्हें ठीक से मिल रहा है या नहीं। इसके हेतु केंद्र जिला प्रशासन, पुलिस, मिडिया से संपर्क रखेगा। उच्च शिक्षा संस्थान की प्रशासनिक या प्रबंध समिति एक वरिष्ठ प्रोफेसर को कोआर्डिनेटर नामित करेगा। यह प्रोफेसर ऐसा होगा जो वंचित वर्ग के कल्याण के प्रति अच्छी धारणा रखता हो। सामान अवसर केंद्र में एक समता समिति होगी जिसका अध्यक्ष संसथान प्रमुख होगा। वरिष्ठ संकाय सदस्य के रूप में तीन प्रोफ़ेसर, सदस्य होंगे, एक कर्मचारी सदस्य, दो समाज के प्रतिनिधि एवं दो छात्र प्रतिनिधि से समिति का गठन होगा। इसका सचिव सामान अवसर केंद्र का कोआर्डिनेटर होगा। समित के ये सभी प्रतिनिध अन्य पिछड़ा, एससी/एसटी, महिला, दिव्यांग वर्ग के होने अनिवा...

उच्च शिक्षा आयोग

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  जब हिन्दू को दो वर्गों में बांटकर उन्हें संघर्ष के लिए आमने सामने खड़ा कर दिया जाय तब हिन्दू एकता की बात तो पाखंड है। और यदि तंत्र पाखंड पर आधारित हो गया हो तो संविधान या प्रजातंत्र का मतलब ही खतम। हम आजाद भारत में गुलामी से बड़ी गुलामी में हैं तो हमारे लिए आजादी का क्या मतलब? यूजीसी अधिनियम ने तो हमारी नागरिकता ही समाप्त कर दी है क्योंकि एक नागरिक का स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा जन्म सिद्ध अधिकार होता है। सरकार क्या कर रही है? वह तो हिन्दू राष्ट्र बनाते बनाते गजब-ए-हिन्द का रास्ता साफ कर रही है। हम ऐसा भी नहीं चाहते कि दलित या पिछड़ा वर्ग पर कोई अत्याचार हो। कानून अच्छी नियत से सबके कल्याण को ध्यान में रख कर बनाया जाना चाहिए़ न कि तुष्टिकरण या दुर्भावना भावना से । यूजीसी अधिनियम सिद्ध करता है कि देशी सरकार हिंदुत्व की खाल में मुगली हुकूमत है, बर्तानिया कब्जेदारी है। जिसका उद्देश्य भारतीय समाज को कलंकित करना और संस्कृति नष्ट करना था। मोदी सरकार धृतराष्ट्र है। उसे द्रोपदी चीर हरण प्रिय है। पांडवों की आँखों के सामने अब उनकी पत्नी ही नहीं बल्कि बहन, बेटियों की इज्जत लुटेगी। मोदी राव...