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Happy Holi

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  "Festivals with Poetic Greetings" by Ramesh Chandra Tiwari is a curated collection of Indian religious, national, and international festivals arranged chronologically. Each entry features concise, informative descriptions alongside heartfelt verse wishes, designed for personal greetings, social media, and professional, relationship-based marketing. When winter ends and spring harvest arrives, the youth blossom and fragrance of love spread everywhere. Now the Holi season takes everyone into ecstasies. On the full moon day of the month of Phalguna, people, so full of fire, celebrate the popular festival of colour and love. It often falls in March, but sometimes in late February. Holi commemorates the victory of Bhagwan Vishnu over Hiranyakashipu. The gatekeepers of Bhagwan Vishnu, Jaya and Vijaya, annoyed Sanak, Sanandan, Sanat Kumar, and as a result, the Kumar’s cursed them, saying they be demons. In Satyuga, they were born to sage Kashyapa and Diti as Hiranyakashipu and Hir...

समय लग सकता है पर क्या रावण बच सकता है

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  जब सत्ताधारियों का ह्रदय भी जातिवाद का भवन बन जाय तो जनता के ह्रदय से राष्ट्रवाद पलायन करने लगता है। सत्ता की उष्मा बहुत मादक होती है - लम्बे समय तक कम ही लोग होश में रह पाते हैं। अधिकतर प्रतिशोध-राजनीति से सीना ठंढा करने लगते हैं। वे रोगाणुओं को मारते-मारते अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट करने पर उतर आते हैं। अंततः ऐसे मतवाले हाथी दलदल में फंसकर असहाय हो जाते हैं। सत्ता का अहम् आर्थिक पतन, जनक्रांति, तख्तापलट, विदेशी हस्तक्षेप को जन्म देता है। मुसोलिनी, अडॉल्फ हिटलर, सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी, मादुरो इसके कुछ उदहारण हैं। पकिस्तान में राजनितिक अस्थिरता का कारण प्रतिशोध राजनीति है। स्थाई और संतुलित राजनीति धैर्य मांगती है, होश मांगती है, अकड़ नहीं लोच मांगती है। जातिवाद से जले बिहार में जहां-तहाँ राख है। यूपी इत्यादि को भी होना क्या ख़ाक है? सत्ता को चाहिए वह एन्टीबायटिक औषधि का काम करे, साइड इफेक्ट न बने। वणिक की तरह वही कौड़ी खर्च करे जो नयी कौड़ियां ला सकती हैं न कि हर कौड़ी को तितर-बितर कर दे। गाय और ब्राह्मण हिंसक नहीं होते, उनसे हिंसा त्रिभुवन स्वामी राजा राम को चुनौती है। समय...

भावनाओं का भाँग

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  राम मंदिर निर्माण, धारा 370 निरस्त, भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान, संशाधनों का अभूतपूर्व विस्तार, आर्थिक और औद्योगिक विकास, ईडब्लूएस कानून, वक्फ कानून में सुधार आदि बहुत सारे सराहनीय कार्य मोदी सरकार ने किये हैं, किन्तु इसमें सवर्ण को क्या मिला? हम राष्ट्रवादी हैं, भारतीय संस्कृति के पोषक हैं इसलिए हमें देश के विकास पर गर्व मिला है। अब यदि अपने सवर्ण वर्ग विशेष की दृष्टि से देखें तो सबसे अधिक हमारा ही नुक्सान हुआ है क्योंकि सबका साथ सबका विकास नहीं बल्कि बड़े को काट छोटे को खैरात हुआ है। साथ ही इसके पीछे अल्पसंख्यक का दोनों धार्मिक और आर्थिक विकास इतना हुआ है जितना आरक्षण से आरक्षित वर्गों को 75 वर्षों में नहीं हो सका। कांग्रेस काल में हमेशा मुस्लिम और दलित का जीवन स्तर सामान रहा है। किन्तु मोदी सरकार के दौरान दलित और ओबीसी वर्ग मुस्लिम रोजगारियों के मजदूर बन गए हैं। मुस्लिम व्यापारियों के उत्थान से सवर्ण व्यापारियों की रीढ़ टूट गई है क्योंकि वे हर तरह से व्यापार नहीं कर सकते। अब यदि बात ब्राह्मणों की करें तो मोदी सरकार में इनकी वही स्थिति हुई है जो स्थिति पकिस्तान में हिन्दुओं की ...

आरक्षित अनारक्षित में विषैला भेदभाव

बीजेपी सरकार ने यूजीसी अधिनियम के माध्यम से आरक्षित और अनारक्षित के बीच में विषैला भेदभाव पैदा कर दिया है जो मिटेगा नहीं। ऐसा अचानक क्यों किया है इसे स्पष्ट रूप से कोई नहीं जानता। कोई कहता है पीडीए कांसेप्ट को निष्प्रभावी करके पिछड़े और दलित को आकर्षित करना है, तो कोई कहता है कि मुख्यमंत्री योगी जी की तेजी से बढती लोकप्रियता को समाप्त करना है। जो भी हो, ऐसी राजनीति देश के लिए अत्यंत अशुभ है। ओबीसी और सामान्य में शून्य भेदभाव था, हिन्दू के नाम पर दोनों को इकठ्ठा करना सरल था और इसी आधार पर बीजेपी का संगठन खड़ा हुआ। मण्डल आयोग ने दोनों को बाँट दिया और तबसे जहां सवर्ण प्रत्यासी होते हैं वहां बड़ी संख्या में ओबीसी वोट कट जाते हैं। किन्तु अब जो हुआ है उसने तो दोनों वर्गों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। परिणाम यह होगा कि जहां ओबीसी प्रत्याशी होगा वहां सवर्ण नोटा ठोंकेगा और जहां सवर्ण प्रत्यासी होगा वहा ओबीसी अपने प्रत्यासी की ओर झुकेगा, वह भले किसी पार्टी का हो। बीजेपी के अमृत काल में काल पैदा हो गया है। आने वाले समय में सवर्ण अपनी अलग राजनीति के विकल्प को तलाशेगा, अपनी बस्तियां मुस्लिम से ...

साहिब से सब होत है

मोदी जी ने बता दिया मैं साहिब हूँ और आप बन्दे: यदि मैं राइ से पर्वत बना सकता हूँ तो एक झटके में पर्वत को राइ भी कर सकता हूँ। लेकिन उन्हें यह भी जानना चाहिए जब बन्दे इकट्ठे हो जाते हैं तो साहिब के साहिब हो जाते हैं। वैसे आपका झोला तैयार हो चुका है, माननीय, क्योंकि अपने गुरु की तरह आपको भी जिन्ना से प्यार हो चुका है। चाहे हिन्दू हिन्दू को बांटो या मुस्लिम राजनीति को पोशो बात एक है। संघ प्रमुख का कहना है "मन में यह भाव नहीं होना चाहिए कि एक को दबाकर दूसरे को खड़ा किया जाना चाहिए। आपस में प्रेम भाव होना चाहिए। समाज को बांटने या बंटने में चिंता होनी चाहिए।" सौ वर्षों से संघ हिन्दुओं को संगठित करने की कोशिश कर रहा है और आपने चुटकी बजाते उन्हें खण्ड-खण्ड कर दिया। सीधा मतलब है कि आपने उस सगठन को दरकिनार किया है जिसने आपको शेर बनाया। यह भी मत भूलो, वह आपको पुनः चूहा भी बना सकता है, उसने ऐसा किया भी है और करने की सोच भी रहा है। आपके मंत्री कहते हैं किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होगी। आपने नाइंसाफी की हद कर दी है तब ये आवाज उठनी शुरू हुई है, कोई अपने पैर में ऐसे ही कुल्हाड़ी नहीं मारता। ...

एआई दिल्ली सम्मलेन

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  एआई दिल्ली सम्मलेन में अमेरिका, चीन और भारत के वैज्ञानिकों में प्रतियोगिता हुई। अमेरिका वाले ने एक रोबोट बनाया जो हू-बहू आदमी की तरह काम करता था। चीन वाले ने उसी रोबोट को लिया और उसे संशोधित करके उसमें मानवीय संवेदना जोड़ दिया। अब बारी थी भारत की, भारतीय वैज्ञानिक बड़ी अकड़ से उठता है और उसी रोबोट को अपने वर्क प्लेटफार्म पर रखता है। दर्शक आश्चर्य में हैं कि अब इसमें नया क्या जोड़ा जा सकता है। किन्तु शीघ्र ही 'मेड इन इंडिया' की मुहर लगाकर गलगोटिया उसे अपने स्टाल पर सजा कर रख देती है। ऐसा भद्द कराया नेहा सिंह ने! उधर भारत मंडपम में ऐसी अफरातफरी होती है कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। स्टानफोर्ड प्रोफ़ेसर सूर्य गांगुली कहते हैं कि अमेरिका में उच्च स्तरीय कंप्यूटर वज्ञानिक अधिकतर भारतीय मूल के हैं। यहां गलगोटिया वाले हैं क्योंकि सारे देश अपनी प्रतिभा को देश की बहुमूल्य संपत्ति मानते हैं, उन पर बड़ी रकम खर्च करते हैं, वहीँ हमारी सरकार को बुद्धिजीवियों से स्वाभाविक चिढ़ है क्योंकि उनकी सपत्ति राष्ट्र नहीं वोट है। आज जो देश तकनीक में पीछे हैं वे फिसड्डी ही हैं। आरक्षण वह चूहा है जो भीतर ...

राष्ट्र स्वस्वामी महाराज का चूहा शेर बन गया

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सरिता समुन्द्र की ओर बहती है, बहते-बहते पहाड़ पर नहीं चढने लगती। चन्द्रमा शीतल होता है, अचानक आग नहीं फेकने लगता। शेर मांस खाता है दाल चावल कभी नहीं। राम ने, कृष्ण ने अवतार लिया धर्म-संत रक्षा हेतु न कि उनसे खेलने हेतु। सभी दैविक पुरुष या तंत्र न चहरे बदलते, न उद्देश्य - चहरे बदलने वाले राम शत्रु होते हैं। केशव की कूटनीति जटिल थी किन्तु राष्ट्रीयता के पीछे शकुनि का पोषण नहीं करती थी। रोहिंग्या रहेंगे, देशी भगेंगे। घर वाले लड़ेंगे, बाहरी पलेंगे। राष्ट्र स्वस्वामी महाराज का चूहा शेर बन गया है - महाराज जी का जीवन संकट में आ गया है। गड़बड़ वहीँ हो गया जब भगवान् मोहक का अवतार कुयुग में हो गया। भगवान् ने करिश्मा दिखया तो भक्तों ने आरती सजाया। भगवान् ने भरमाय तो उन्होंने दीपक फूंक-फूंक कर बुझाया। लोग चकित हैं कि भगवान् भाई असली हैं या नकली?