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Showing posts from February 8, 2026

बाहर नहीं युद्ध घर में कराया

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  एक शेर जंगल से इस तरह भाग रहा था जैसे मौत उसके पीछे पडी हो। माइक लेकर लोमड़ी दौड़ी और पूछा,"शेर भाई क्या हो गया? शेर ने हांफते-हांफते कहा, "मेरे पीछे एक भयानक महिला पड़ गई है। मौत में इज्जत मर्यादा तो फिर भी बची रहती है।" तभी एक तेंदुआ भागते दिखा। लोमड़ी उसके पास भी पहुंची और वही सवाल किया। तेंदुवा बोला, " एक पडोसी तेंदुवा जब मुझसे जीत नहीं सका तो मदद के लिए एक एससी भाई के पास चला गया।" इतना कहते हुए वह रोने लगा। इतने में सभी शेर, बाघ, तेंदुआ, चीते इकट्ठे होकर जो चिल्लाने लगे। लोमड़ी दौड़ी और पूछा अब क्या हो गया? एक शेर आगे आता है और माइक पकड़ता है : "जंगल के राजा ने जंगल के बाकी सभी नागरिकों को बन्दूक पकड़ा दिया है और उनसे कहा है जहां भी शेर, चीते या उनके बच्चे दिखें उन्हें खोज-खोज कर मारो।" हमारे चारों और इतने भाले, इतने कांटे बिछा दिए हैं सरकार ने कि जीना तोबा हो गया है। आरक्षित समाज के एक प्रतिशत लोगों को शायद ही आरक्षण का लाभ इन 77 वर्षों में मिल सका होगा किन्तु इसका नशा व्यापक हैं? मुगलों, अंग्रेजों ने तो प्यार किया था - सारा अत्याचार केवल सवर्णों ने ...

व्यक्तिगत विवाद

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  एक समय था जब लोग बड़े सम्मान से कहते थे "ठाकुर साहब" "पण्डित जी"। आज दोनों उपाधियाँ जैसे गाली बन गई हों। अंग्रेज बूट की ठोकर लगा कर कहते थे "इंडियन डॉग", मुग़ल तिरस्कार से कहते थे "काफिर"। किन्तु ये तो मालिक थे इनके द्वारा किये गए अपमान को भूल जाना चाहिए। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के लिए प्रचार करना पड़ता है "मैं पिछड़ा हूँ, मैं दलित हूँ"। जब आप अपने को पिछड़ा या दलित कहने में गर्व करते हो तो समरसता के लिए कम से कम हमें भी साहब या जी को हटाकर ही कहने दो मैं ठाकुर हूँ या पंडित हूँ। सामने वाला कहता है, "कौन सी जाति की हो ? गर्मी दूर कर दूंगा !" इसमें घोर अहंकार है ! फिर भी इस अहंकार को बुरा नहीं माना जाएगा ! अहंकार तो तब हुआ जब आस्था सिंह ने जवाब में अपना जाति बता दिया। 6 जनवरी की घटना 6 फरवरी के बाद वाइरल की जा रही है। दो सामान जातियों के लोगों ने गुस्से में एक दूसरे को गर्मी दिखाई और बिना किसी को नुक्सान किये शांत हो गए। इसका उद्देश्य निश्चित राजनीतिक है जिसके माध्यम से यह प्रचार करना है कि ठाकुर में अहंकार है । जबकि राजनीत...

एआई

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  जिस तरह कृषि उपकरण ने देशी पशुओं को आवारा कर दिया है, सामान्य जनमानस को उसी तरह एआई आवारा करने वाला है। सकल घरेलू उत्पाद का 50 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा सेवा क्षेत्र है, एआई मुख्य रूप से उसे ही टारगेट करने वाला है। पारम्परिक नौकरियाँ तो समाप्त ही होंगी, आईटी सेक्टर की नौकरियों को भी यह खा जाएगा। खैर ये तो दूर की बात हुई, नौकरियों के नाम पर सरकार की भी नीयत अच्छी नहीं रही है। एक आधार कार्ड में संशोधन आज के दिन तारे तोड़ने जैसा कार्य है और एक नया आधार कार्ड बनवाना तो इस पृथ्वी का सबसे कठिन कार्य हो गया है। यदि आधार एक आवश्यक कार्ड है तो सरकार आधार विभाग की सरकारी शाखाएं देश भर में क्यों नहीं खोलती जिसमें लाखों युवकों को रोजगार तो मिलेगा ही साथ ही जनता को भी सुविधा होगी। आज सरकार को जानने की जरूरत है कि राज तंत्र कोई बहुत मजबूत चीज नहीं है। यदि बड़ी संख्या में युवक वेरोजगार हो गए तो बांटो और राज करो से काम नहीं चलेगा - सारा तंत्र ध्वस्त हो जाएगा। पकिस्तान का राजतंत्र विगड़ चुका है। श्रीलंका और नेपाल में तो कोई तंत्र ही नहीं है। भारत सरकार को सावधान होना चाहिए। मॉस में युवक वेरोजगार हों...