उस जनता की रीढ़ तोड़ने लगे जो देश की रीढ़

 

वोट-प्रेम और राष्ट्र-प्रेम दो अलग-अलग चीजें हैं। राष्ट्र को नुकसान किये वगैर यदि सत्ता प्राप्त किया जाय तो सकारात्मक राजनीति कहते हैं किन्तु राष्ट्र को कमजोर करके सत्ता हथियाने को नकारात्मक राजनीति कहते हैं। खैरात बांटना देश को दोहरा नुकसान पहुंचाता है : खाने वाले को निकम्मा करता है तथा टैक्स से कर्मयोगी जनता को हतोत्साहित करके उसका विकास रोकता है। चीन में हर घर में उद्योग है यहां हर घर में ठर्रा है और मुफ्त का अनाज है। हर देश में सभी नागरिकों के अधिकार सामान हैं और मुफ्त की योजनाएं केवल गरीब, असहाय लोगों के लिए हैं। यहां विशिष्ट वर्गों के अफसरों, नेताओं और अमीरजादों के लिए कानूनी सुरक्षा है और आरक्षण की भीख है। यदि यही उनके गरीबों को मिल जाय तो उनका कल्याण हो जाय। साथ ही लाभ प्राप्त लोगों का सामान्य में जुड़ने से सामाजिक बैमनस्य भी दूर हो जाय। इतनी नकारात्मक राजनीति से मोदी सरकार का जी नहीं भरा तो उसे देश की प्रतिभाओं का दमन सूझ गया और यूजीसी लेकर आ गयी। स्वयं राजा जब हीन भावना का शिकार हो जाय तो देश का विघटन कौन रोक सकता है। मैं पिछड़ा चाय वाला दीनहीन कहते-कहते सामान्य वर्ग से स्वाभाविक नफ़रत हो गया, खुद अच्छे से पढ़े-लिखे न होने के कारण मेधावी छात्रों से ईर्ष्या झलक गई। आपने ईमानदारी से काम किया है इसमें दो राय नहीं, आपने आर्थिक एवं धार्मिक दोनों विकास किया है। अचानक आपको क्या हो गया कि आप उस जनता की रीढ़ तोड़ने में लग गए जो देश की रीढ़ है। अब कुछ यह भी स्पष्ट होने लगा है कि द्वारका शारदा और ज्योतिर्मठ दो पीठों के शंकराचार्य प्रातः स्मरणीय स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती आपसे क्यों चिढ़ते थे।

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