विप्र देवता
जिन्हें नहीं विश्वास स्वयं पर, वे समूह में चलते हैं,
रातों में एकांत मार्ग पर, कदम नहीं रख सकते है।
जो चलता है सदा अकेले, करता शयन अकेले है,
वही असंभव संभव करता, भू पर शाम सबेरे है।
विप्र देवता, भेंड़ नहीं हो, न भैंसों की हो तुम भीड़ !
तुम ज्ञानी हो वंश बाघ के, मात्र राष्ट्र की तुम हो रीढ़।
आँख दिखाते हैं गीदड़, तो खड़ी लोमड़ी गुर्राती
एक कहीं यदि हो जाते, तो दुनिया तुमसे थर्राती।
तुम तो भरत तिवारी हो, वर्दी वालो पर भारी हो,
हर भाई की फ़िक्र तुम्हें है, तुम तो राम पुजारी हो।
शास्त्र बनाया है तुमने, तो शस्त्र बनाये भी तुमने,
अलग संगठित होने में, फिर देर लगाया क्यों तुमने?
-Poet Ramesh Tiwari
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