राष्ट्र सर्वोपरि है
हम सवर्णों को उन दलित और पिछड़े भाइयों के प्रति पूरी श्रद्धा और सहानुभूति है जो अत्यंत गरीब और तिरस्कृत हैं और जो अलगाववाद का समर्थन नहीं करते बल्कि भारतीय संस्कृति में पूरी निष्ठां रखते हैं। हम चाहते हैं कि आरक्षण का लाभ यदि इन लोगों तक पहुंचाया जाय तो आरक्षण जारी रहना चाहिए और यदि इससे देशद्रोही, विधर्मी, बिलासी वामपंथियों को पोषित होना जारी रखना है तो आरक्षण समाप्त होना चाहिए। "धर्म पाखंड है, मनुवाद मुरादाबाद, राम काल्पनिक हैं, राम चरित मानस को बैन कर दो, वन्दे मातरम साम्प्रदायिकता है" आदि राष्ट्र और सनातन आस्था से द्रोह की अभ्व्यक्ति न तो दलित करता है, न पिछड़ा और न ही सामान्य बल्कि तीनों में से हिन्दू के वेश में देश को धोखा देने वाले ठग करते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें यह भय है कि कहीं ऐसा न हो जाय कि इनसे लगातार आरक्षण की लग्जरी छिन जाय और लाभ गरीब दलितों व् पिछड़ों को मिलने लगे। अथवा ये लोग उस पार्टी के समर्थक हैं जो किसी वर्ग को नहीं बल्कि कुछ अपनी जातियों के लोगों को सरकारी नौकरियाँ परोस देती हैं। ये खानदानी वेतन भोगी देश पर भार हैं - इन्हें किसी भी लाभ से तुरंत वंचित करने की आवश्यकता है। एक धर्म है जिसमें मेढक हैं जो एक वर्तन में नहीं रुक सकते। दूसरा धर्म है जिसमें केकड़े हैं, वे वर्तन से बाहर जा ही नहीं सकते। दोनों के अपने-अपने गुण और दोष हैं। खैर, राष्ट्र सर्वोपरि है, इसकी अखंडता से समझौता नहीं होनी चाहिए, और इसके स्वाभिमान की कीमत पर हमें व्यापार नहीं चाहिए।
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