सामाजिक एकता के भाषण
जब समाज तोड़ने के कानून बन रहे होते हैं तब उसके पहले सामाजिक एकता के भाषण होने लगते हैं। उदहारण के तौर पर "एक रहोगे तो सेफ रहोगे" या "बंटोगे तो कटोगे" भाषण के बाद यूजीसी आता है और जाति-जाति में दुश्मनी घोल कर रख देता है। भाषण आता है "सबका साथ, सबका विकास" किन्तु सवर्णों के खून पसीने की कमाई को उड़ाता है नेता और खाते हैं देश के बोझ खैराती। भाषण होता है सबके साथ सामान न्याय की और एससी/एसटी एक्ट से अन्याय का बांध खोल दिया जाता है। कार सेवकों पर गोली चलवाने वाले मुख्य मंन्त्री के बारे में तीखी बयानबाजी की जाती है किन्तु उनका सम्मान पदम् विभूषण से होता है। सारे विरोध के वावजूद अंकिता भंडारी हत्याकांड के आरोपी दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राजपाल नियुक्त कर दिया जाता है। भाषण होते हैं हिंदूवाद के और नीतियां बनती हैं अल्पसंख्यक कल्याण की। साथ ही जो वर्ग हिंदुत्व का आधार है उसे खलनायक बना दिया जाता है। औरंगजेब ने हिंदुत्व को समाप्त करने के लिए हार्डवेयर पर हमला किया था यहाँ तो हिन्दू सॉफ्टवेयर ही डिलीट करने की कोशिश चल रही है। मोहम्मद गजनवी ने मंदिरों को लुटेरों की तरह लूटा था यहां दौलत के भूखे मंदिरों के स्वयं मालिक बनकर बैठे हैं। आयुष्मान योजना दिखने में लगता है गरीबों के स्वास्य के लिए है किन्तु वास्तव में हॉस्पिटल के माध्यम से रकम नेता टंकी में बह रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य को माननीय लोगों की सहज आय के लिए ही तो प्राइवेट किया गया है। जैसा बाहर दिखता है भीतर बिलकुल उल्टा है। भ्रम मत पालो कि कोई पार्टी तुम्हारी है। भारत चीन नहीं है कि जिसमें सरकार का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण हो। यहाँ सभी पार्टियां स्वनिर्माण में लिप्त हैं।
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