दुश्मनी नहीं फिर भी सभी दुश्मन


आज आप अपने ही समाज में सहज नहीं हैं। बात करते समय आपको ध्यान रखना पड़ता है कि आप किस जाति के व्यक्ति से बात कर रहे हैं। किसी से कोई दुश्मनी नहीं फिर भी सभी एक दूसरे के दुश्मन हैं। एक जाति वाला दूसरे जाति वाले को ऐसे देखता है कि जैसे दोनों ने एक दूसरे के बाप की ह्त्या की हो। दलित से बातें करना तो बिजली के तार पर काम करने जैसा है। सरकारी कार्यालयों में डेलीवेज चपरासी अधिकतर सवर्ण होते हैं - उन्हें तो ये लोग बात-बात में माँ बहन की गाली देते रहते हैं और दूसरों को ब्रम्हास्त्र की धमकी। सनातन समाज में मूल रूप से वर्ण व्यवस्था थी। ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र पदवी या उपाधियाँ होती थी - जो जिस योग्य होता था उसे वही पदवी मिलती थी। जब विदेशियों की घुसपैठ होने लगी तब भारतीय नस्ल को बचाने के लिए इसे जन्म से जोड़ दिया गया था। पौधे, फसलें, जानवर सब एक जैसे नहीं होते - सबकी जातियां होती हैं। क्या सभी को ब्राह्मणों ने बनाया है? यदि मानते हो कि ब्राह्मणों ने बनाया है तो वह ईश्वर है। जातिवाद सरकारें करें, जातिवाद सभी करें और दोष ब्राह्मण को? जिसने आर्थिक अथवा शारीरिक असमर्थता के अतिरिक्त जाति के आधार पर क़ानून बनाया था उसने कालान्तर में देश के एक और विभाजन का षड्यंत्र किया था और इस षड्यंत्र में केवल कांग्रेस ही नहीं बीजेपी भी शामिल है। एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 11 सितंबर 1989 में राजीव गांधी की सरकार ने पारित किया था जिसे 30 जनवरी 1990 को बीजेपी के समर्थन वाली विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने लागू किया था। 2018 में मोदी सरकार ने इस क़ानून को एकतरफा कर दिया। इसी तरह मंडल आयोग के बनने और लागू होने में बीजेपी की उपस्थिति रही है। इन्हीं का समर्थन था जब काश्मीर से पंडित भगाये गए। किसी ने मोदी सरकार से मांग की थी कि यूजीसी लागू कर दो? बाबा साहब ने ठीक ही अपने समाज के लिए अलग बस्तियों का विचार रखा था तथा पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की थी। यदि राजनीति ऐसी ही रही तो सवर्ण और दलित एक साथ नहीं रह सकते।


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