बहन बेटी करने की राजनीति
आज तक बहन बेटी करने की राजनीति नहीं हुई थी, वह भी हो रही है। वामियों को छुट्टा कर दिया गया है जाओ सनातनियों को जी भर गाली बको, उनकी बहन, बेटी करो। बड़े-बड़े अधिकारी हों, रावण हों, कंस हों सबके मुंह गंदे हो गए हैं। पहले हिन्दू समाज इतना असभ्य नहीं था। इसके विपरीत हिन्दू धर्म की अलख जगाने वाले साधू संतों के मुंह बंद कर दिए गए हैं। मंदिरों में डकैतियां पड़ रही हैं। शराब की इतनी दुकाने खुलीं हैं कि सभी जाति वर्ग के घर उजड़ रहे हैं। औरतें वस्त्रहीन विचरण कर रही हैं जिससे लब जिहाद सरल हो गया। शिक्षा की तो धज्जी उड़ा दिया है, पढ़ो या न पढ़ो सब पास। प्राथमिक विद्यालयों में सदाचार की शिक्षा समाप्त हो गयी है। चारों ओर असभ्यता का माहौल है, गाली गलौज है। कोई नाली में लुढ़का पड़ा है, कोई मुर्गा मटन नोच रहा है। यह स्थिति पूरे हिन्दू समाज की है। सबकी अगली पीढ़ी वर्बाद हुई जा रही है। जब राजा संस्कारी होता है तब देश में संस्कार फैलता है और जब व्यभिचारी होता है तो व्यभिचार का वातावरण बनता है। जब राजा शिक्षित होता है तब देश शिक्षा के क्षेत्र में आगे होता है किन्तु जब वह अशिक्षित होता तब असभ्यता नाचने लगती है। जब राजा प्रशासन का महत्त्व जानता है तब वह सरकारी विभागों को अच्छे से चलाता है, नौकरियाँ देता है, पढ़े लिखे लोगों की कदर करता है। अन्यथा उन विभागों को बेचकर ठेले लगवाता है। राष्ट्रपिता की तरह सरकार बहादुर का ह्रदय मूल रूप से सनातनी नहीं रहा है। उन्होंने हिंदूवादी पार्टी में होने की वजह से हिन्दूवाद का जीवंत नाटक किया है जिसकी जितनी सराहना की जाय कम है। उन्होंने धीरे-धीरे चुपके-चुपके विद्वानों और हिन्दू धर्मावलम्बियों को घेरने का कानून बनाना शुरू किया किसी को भनक नहीं लगी क्योंकि बेहतरीन चन्दन लगाकर ये मंदिर, वो मंदिर, साष्टांग दंडवत, पहाड़ों पर तपस्या - कोई शक नहीं कर सकता था।
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