अबकी बार 400 पार
2024 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी यह कह कर चूक गई कि 'अबकी बार 400 पार'। विपक्षी दलों ने इसका फायदा उठाया और प्रचारित कर दिया कि बाबा साहब के संविधान को बीजेपी बदल देना चाहती है। इस दूध से बिल्ली इस तरह से जली कि उसके दिमाक की गहराई में बैठ गया कि केवल दलित वोट से ही चुनाव जीते जा सकते हैं। फिर क्या था सरकार बहादुर को दलित वर्ग चाहिए चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उन्होंने अपने समर्पित वोटरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की और उनकी कीमत पर यूजीसी 2026 लाकर पटक दिया। सिद्धांत यह कहता है कि यदि किसी एक चीज का नुकसान हो गया हो तो उसको ठीक करने के लिए दूसरे मूल्यवान चीज को दांव पर नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ऐसे में दोनों हाथ से निकल सकते हैं। माहौल अब कुछ इसी तरह बन चुका है। लगता है सवर्ण अब कोई विकल्प खोज लेगा और दलित अपनी अगली पीढ़ी की वेरोजगारी से दुखी होकर पुरानी डाल पर लौटना पसंद करेगा। इसके अतिरिक्त एक और विषय है जिसे सरकार बहादुर को सोचना चाहिए। गहरे जातिवाद के आधार पर किसी एक प्रांत का चुनाव जीता जा सकता है किन्तु केंद्रीय सत्ता सभी वर्गों के वोटों से प्राप्त होती है जैसे बीजेपी इसके पहले दो बार जीत चुकी है। मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मैं बीजेपी का विरोधी हूँ। बीजेपी मेरे पूर्वजों की पार्टी है उससे मुझे प्यार है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय हमारे एक पितामह ने भीख मांग-मांगकर सभी वर्ग के छात्रों की अच्छी शिक्षा के लिए बनाया - आज उसकी दीवारों पर लिखा जाता है ब्राह्मणवाद मुर्दावाद। राष्ट्र विरोधी विचारधारा का शमन करने के लिए हमारे पूर्वजों ने खून पसीना एक करके संघ और बीजेपी को खड़ा किया - आज जब बीजेपी ही सत्ता में है तब भी ब्राह्मण देश में अछूत बन गया है। चारों तरफ से गालियां, चारों तरफ से अपमान ब्राह्मण झेल रहा है और चुप है। बहुत से ऐसे प्रांन्त हैं जहां से सवर्ण पलायन कर चुका है। यद्यपि सवर्ण में कुछ बुराइयां हैं : बीस ब्राह्मणों का एक समूह बैठा हो उसमें आप ब्राह्मण होकर भी आत्मीयता से बैठ नहीं सकते, आपको उलझन होगी कि यहां से हट लो क्योंकि उनमें किसी में भाई का प्रेम नहीं होगा बल्कि अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की प्रतियोगिता होगी। दुनिया में हर जाति, हर धर्म के लोग आपस में प्यार से बैठते हैं, ब्राह्मण आपस में अहंकार की भावना से बैठता है। इसी वजह से वह किसी आंदोलन में सफल नहीं हो सकता। जन्तर-मंतर में सवर्णों का आंदोलन फेल हो गया है किन्तु वास्तव में इस आंदोलन ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है क्योंकि जो सवर्ण कल तक बीजेपी के समर्थक थे इस आंदोलन की विफलता ने उनकी सोच बदल दी है।
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