जबरा मारय, रोवय न देय
एक देशी कहावत है "जबरा मारय, रोवय न देय" अर्थात बाहुबली मारता है साथ ही रोने भी नहीं देता। आजकल यूजीसी शब्द सार्वजनिक जगहों पर प्रतिबंधित है क्योंकि वह नेता लोगों के लिए गाली बन गया है। वकील हो चाहे पत्रकार, तुम्हारी ये मजाल कि माननीय डिप्टी सीएम महोदय को परेड मैदान प्रयागराज में आयोजित प्रबुद्ध महाकुंभ में यूजीसी कहोगे और बिना थप्पड़ की चटनी चाटे वहां चले जाओगे ? अच्छे दिन तब आते हैं जब अंग्रेजों की तरह जनता को जातियों में फंसाकर टैक्स के लिए उसके गले पर पैर रख दिया जाता है। पंडितवा मारा गया - बड़ा मजा आया ! ठकुरा को गाली दिया गया - बड़ा मजा आया ! ये कमीने, कुएं में पानी नहीं भरने देते थे, स्कूल जाने नहीं देते थे। अब मौका मिला है हम स्कूल, कालेज में कानूनी तौर पर इनकी मां-बहन करेंगे, इन्हें पढ़ने नहीं देगें - भले हमारे लिए भी काला अक्षर भैंस बराबर क्यों न हो जाए। एक उज्जल अंग्रेज आया था, वह पकिस्तान बना गया। राष्ट्रवादी सांवला अंग्रेज कम से कम एक "ब्रह्मलोक" तो बना ही देगा। ये सबरन बेचारे कहाँ जाएंगे ? इन्हें अमेरिका भी रखना नहीं चाह रहा है क्योंकि वह मोटासा हो गया है इसलिए चर्बी कम करना चाहता है। देशद्रोह का ठेका तो विपक्ष को है। सरकार बहादुर के हाथ में देशद्रोह है ही कहाँ ? उधर विपक्ष वालों के अब्बा पकिस्तान और चच्चा बंगलादेश से आते हैं। उन्हें अखण्ड पकिस्तान चाहिए। इसलिए वे "ब्रह्मलोक" बनने ही नहीं देना चाहते। इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जब तक जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक एवं भाषाई तुष्टिकरण के राजनीति की छूट रहेगी तब तक यह देश बंटता रहेगा और नेता इसे लूटता रहेगा।
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