मार्मिक कहानी

 



जीवन अमृत

अचानक जहाज़ में अफ़रा-तफ़री मच गई । “हे भगवान अब क्या होगा ! बचाओ ! बचाओ ! अब बचने का कोई रास्ता नहीं – प्रभु मुझे स्वीकार करो, मैं आ रहा हूँ ! मुझे तो नर्क मिलेगा, प्रार्थना के लिए अब समय ही नहीं !”  मौत के भय से बौखलाए यात्री ऐसा कह-कह कर इधर-उधर भटकने लगे । सबके चहरे उड़े-उड़े, सब घबड़ाये हुए, दरवाजे की ओर भीड़ लगाने लगे । “देखो कह रहा था ट्रेन से चलो, आसमानी दुर्घटना में बचने की कोई गुंजाईश नहीं होती,” एक बृद्ध अपनी पत्नी से कह ही रहा था कि जहाज़ एक झाड़ी पर आ गिरा । उसी के साथ न जाने कैसे दरवाजा खुल गया और एक झुण्ड भर लोग ज़मीन पर आ गिरे । कुछ तो तुरंत मर गए और कुछ थोड़ी देर कराहने के बाद मरे किन्तु उस झुण्ड के ऊपर पड़े दो युवक बच गए । उधर आग की लपटों ने जहाज़ को लपेट लिया ।

सहमा हुआ समीर थोड़ी देर बाद अपना सर उठाता है और उठकर बाहर आता है । फिर आँख फैलाकर देखने लगता है कि उनमें से और कौन जीवित है । उसकी निगाह अपने साथी रजत पर पड़ती है जो उठने की कोशिश कर रहा होता है । समीर आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ता है और सहारा देकर उसे बाहर निकालता है ।  तभी बगल में जल रहे जहाज की आग आस-पास सूखी झाड़ियां में भी फैलने लगती है और धीरे-धीरे पड़े हुए शवों को भी घेर लेती है । दोनों स्तब्ध भाव में उन अग्नि लपटों को निहार रहे होते हैं कि देखते-देखते सब कुछ खाक हो जाता है । वे भय और सहानुभूति की पीड़ा से कांप उठते हैं । इन दोनों युवकों की जान तो बच जाती है किन्तु इनके पास पहने हुए वस्त्र के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता है ।

“रजत, जो कुछ होना था वह हो गया !” समीर ने रुंधे हुए स्वर में कहा ।

रजत ने कुछ सुना नहीं क्योंकि वह उन लोगों को सोच रहा था जो थोड़ी देर पहले जहाज़ में उसके साथ थे और पलक झपकते सभी राख के ढेर हो चुके थे । भयावह दृश्य ने समीर को भी झकझोर कर रख दिया था फिर भी उसे इतना होश था कि अब आगे कम से कम अपने जीवन को तो बचना ही है ।

रजत के कंधे पर हाथ रखते हुए उसने फिर कहा, “रजत, रजत – होश में आओ ! दस बज रहे होंगे, सूरज तेज हो रहा है । यहाँ चारों तरफ पठार, सूखी वनस्पतियों का जंगल बहुत दूर तक फैला दिख रहा है । कहीं न तो बस्ती है न गाँव । आस-पास हिंसक जानवर भी हो सकते हैं । हमें यहाँ से तुरंत निकल कर किसी बस्ती की खोज करना ही होगा । पता नहीं इस जहाज़ की खोज करने कोई आता भी है या नही और कोई आएगा तो कब आएगा यह भी निश्चित नहीं है । अरे हाँ, तुम्हारा फोन कहाँ है ?”

रजत अपनी जेब में हाथ डालकर मोबाइल फोन खोजता है । “समीर, मेरा फोन तो कहीं गिर गया । तुम ज़रा अपने फोन से काल करो ।“

“मैने अपना फ़ोन बैग में रख दिया था,” समीर ने उत्तर दिया । 

दोनों इस उम्मीद से कि शायद कोई मोबाइल जलने से बच गयी हो उसे खोजने का खूब प्रयास करते हैं किन्तु उन्हें निराश होना पड़ता है । इसके बाद उन्हें लगता है कि वहां से चल देने के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं है । बेर तथा पठारी घास की झाड़ियो के बीच वे निकल पड़े । ज़मीन कंकरीली, इलाक़ा इतना निर्जन कि कहीं चिड़ियाँ भी नज़र नहीं आ रही थीं । धूप अत्यंत तेज थी और कहीं कोई पेंड ऐसे नहीं थे जिसके नीचे छाया हो । दो घंटे चलने के बाद उन्हें प्यास महसूस होने लगी ।

रजत ने कहा, “समीर भाई, हमें लगता है हम लोग प्यास से अवश्य मर जाएँगे क्योंकि कहीं कोई जगह ऐसी नहीं दिख रही है जहाँ पानी हो ।“

 “अरे हाँ, मैने तो इधर ध्यान ही नहीं दिया था,” समीर ने उत्तर दिया ।

“देखो, हमें अभी तक किसी भी तरह का कोई जीव व जानवर नहीं दिखा और न ही कोई हरा पेंड या पौधा । इसका मतलब इस इलाक़े मे पानी कहीं नहीं है ।“  

“अब बताओ क्या किया जाय मुझे तो प्यास लग रही है ।“

“अब हम केवल एक काम कर सकते हैं कि अपने प्यास की ओर ध्यान न देकर जिधर कुछ हरा दिख रहा हो उधर चलें,” रजत ने सुझाव दिया ।

“हाँ तुमने ठीक कहा । वो देखो, दूर उँचे पेंड़ दिखाई दे रहे हैं ।“

फिर इसके बाद दोनों ने उसी ओर अपनी दिशा निश्चित की और आगे बढ़ने लगे । घंटों चलने के बाद भी वे पेंड़ उतने ही दूर दिख रहे थे । दोनों का गला सूखने लगा, हाथ पैर ढीले पड़ने लग गये । कहीं कोई छाया नहीं, बस सूखी झाड़ियाँ और पथरीली धूल । इतने में उन्हें एक उँची चट्टान दिखी जो सूरज की विपरीत दिशा में एक गुफा की तरह कटी हुई थी । समीर और रजत बहुत थक चुके थे वे उस चट्टान की छाया में पहुचते पहुचते लगभग गिर पड़े । थोड़ी सी छाया तो मिली किन्तु उन्हें पता था कि समय बिताना उनके लिए कितना महँगा पड़ सकता था ।

रजत ने कहा, “यदि उन पेड़ों तक पहुचने से पहले प्यास की वजह से हमारे पैरों ने धोखा दे दिया तब क्या होगा, मित्र समीर ?”

“क्या होगा – हम उन साथी यात्रियों से भी बुरी मौत मरेंगे ।“

काफ़ी चलने के बाद उन्हें पेंड़ साफ़-साफ़ नज़र आने लग गए । उन्हें कुछ उम्मीद जगी, यद्यपि वह स्थान अभी भी काफ़ी दूरी पर था क्योंकि पहाड़ी इलाकों में दूरी का सही अंदाज़ा नहीं लग पाता ।

चलते चलते समीर ज़मीन पर लुढ़क गया । रजत ने उसे सहारा देकर उठाया, “क्या हुआ?” उसने पूछा और उत्साह बढ़ाते हुए कहा, “थोड़ा और धैर्य रखो समीर अब हम बहुत दूर नहीं हैं ।“

वे फिर चल पड़े । जूता पहने थे फिर भी उनके पैरों में छाले पड़ गए थे - पैर जमीन पर रखा नहीं जा रहा था । एक एक कदम दुस्वार था । समीर की स्थिति विगड़ने लग गयी । वह वेहोश सा हो रहा था । “अब तुम जा सको तो जाओ, मैं एक कदम नहीं चल सकता !” कहते कहते वह जमीन पर लुढ़क गया ।

दोपहर के तीन बज चुके थे सूरज अभी भी आग उगल रहा था । पठारी जमीन जल रही थी, आस-पास न कहीं पेंड न छाया । रजत ने समीर को उठाकर अपने कन्धों पर रखा और एक बार फिर चल पड़ा, किन्तु कुछ ही दूर जा सका कि उसका सामर्थ्य टूट गया और वह समीर के साथ जमीन पर गिर पड़ा ।

रजत ने खुद को संभाला । फिर समीर का चेहरा अपनी हथेली पर रख कर हिलाते हुए बोला, “मेरे भाई समीर, थोड़ा और हिम्मत कर । देख वहां कुछ जंगल जैसा दिखाई दे रहा है । बस किसी तरह हमें वहां पहुंचना है । मुझे लगता है अब बहुत दूर नहीं है । उठ भाई उठ !”

दोनों एक बार फिर संभले, लड़खड़ाते-लड़खड़ाते चलने लगे और काफी दूर तक जाने में सफल हो गए । किन्तु समीर अचानक वेहोश सा होने लगा । रजत की शक्तिहीन बाहें उसे थाम न सकीं । वह धूप से तप्त एक उभरे हुए पत्थर पर गिर कर फ़ैल गया । रजत भी पस्त था वह भी क्या कर सकता था । समीर के सिर को उसने अपने पैरों पर रखा और हाथ से उसके चहरे को सहलाने लग गया । सूखी पत्तियों वाला जंगल वहां से केवल कुछ ही मीटर दूर था किन्तु अब उतनी दूरी भी उनके लिए हजारों मील के सामान थी ।

रजत रो रहा था, आँखें सूखी क्योंकि उनमें आंसू भी सूख चुके थे । उसने समीर को एक बार फिर उठाने की कोशिश की परन्तु इस बार उसके हाथ पैर उस भार को उठाने में सक्षम नहीं रह गए थे । जितनी बार कोशिश करता, हर बार वह जमीन पर खुद भी गिर जाता । उसने पूरी इच्छा शक्ति के साथ बल लगाया - उसकी बाँहों में समीर का शरीर लटक गया । वह जोर से रोना चाहता था, रो न सका बल्कि स्वयं वहीँ कंकड़ों पर लेट गया । उसे थोड़ी देर बाद होश आया, उठकर बैठा, मित्र के खोने के संताप में शून्य सा । अब उसके पास कोई विकल्प नहीं था सिवा इसके कि वह खुद बच सके तो बचे ।

मौत के भय से किसी तरह गिरते लुढक़ते वह जंगल के पहले पेंड़ तक पंहुचा । उस पेंड़ की पत्तियाँ लगभग मुरझाई हुई थीं । यहाँ विश्राम में उसे थोड़ी सी राहत मिली क्योंकि नीचे मिट्टी की जमीन थी और ऊपर हल्की सी छाया थी ।

थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक विशालकाय मशीन सामने जंगल से गुजर रही है । उसने सोचा कि जो लोग मशीन लिए जा रहे हैं उनके पास पानी अवश्य होगा । वह उठ खड़ा हुआ और उनके पास तक पहुंचने के लिए चल पड़ा । उन लोगों के चलने की रफ़्तार तेज थी इसलिए रजत का कमजोर शरीर उनके पास तक पहुँच न सका, यद्यपि हिम्मत बांधे वह उनका पीछा करता रहा ।

कुछ दूर आगे जाने पर रजत ने देखा कि एक गाय उठने की कोशिश तो कर रही लेकिन उठ नहीं पा रही है । मशीन वहां रुकती है और उस पर सवार लोग उतर कर उसको पानी पिलाते हैं । यहाँ उसे कुछ उम्मीद जगी कि वह शायद उन लोगों तक पहुंच सकता है । उसने पूरी ताकत झोक दी किन्तु गिर पड़ा, हांफने लगा, फिर उठ खड़ा हुआ, चला, फिर गिर पड़ा । तब तक मशीन ने वहां से प्रस्थान कर दिया ।

रजत ने हिम्मत नहीं हारी, वह उठा, फिर पीछा करने लग गया । चलता गया, चलता गया कि उसने देखा आगे जहाँ मशीन जा रही थी वहां सड़क के किनारे कुछ बंदर हैं जिनकी हड्डियाँ उभरी हुई हैं । वे कातर आँखों से उन लोगों को देख रहे हैं । उन्हें पानी पिलाने के लिए वे लोग यहाँ भी रुकते हैं और चल देते हैं । रजत इस बार भी सारी कोशिश करता है किन्तु उनके पास पहुंचना तो दूर, मशीन उससे बहुत आगे निकल जाती है ।

अब रजत को कुछ मकान दिखने लगे । आगे और गया तो उसने देखा कि कुछ ही दूरी पर एक गाँव है जिसके पीछे वह मशीन जाकर ओझल हो गयी । उसमें मात्र एक कदम चलने का सामर्थ्य नहीं था - उसे तो उम्मीद की शक्ति चला रही थी ।

रेंगते-रेंगते वह एक मकान के दरवाजे तक पंहुचा ।  बाँस की टट्टी से बन्द दरवाजे के सामने उसे एक कुत्ता दिखा जो मर चुका था और अन्दर की तरफ खाट पर लेटा एक बृद्ध दम तोड़ रहा था । इसे देखकर रजत भय से कांप उठा । वह पड़ोस के एक दूसरे घर के सामने पंहुचा । वहाँ उसने देखा कि एक काली सी महिला अपने शरीर का रक्त अपने शिशु को पिला रही है । यह देखकर उसका ह्रदय भर आया, वह स्वयं विवश था । नंगे बृक्षों के नीचे गधे पड़े थे, अधमरे सुअर उलटे हुए, मुँह खोले जमीन पर अपने पैर रगड़ रहे थे, मुर्गियां विछी हुई थीं ।

मशीन की तलाश में रजत दो मकानों के बीच की गली से गुजर कर जब उस पार पंहुचा तो वहां उसे कुछ खेत दिखे जिनकी ज़मीन सूखकर टुकड़ों टुकड़ों में चिटक गयी थी ।

अचानक उसकी निगाह खेतों से लगे एक मैदान की तरफ गयी जहाँ वह मशीन खड़ी थी । अब उसे भरोसा हो गया कि उसे पानी मिल सकता है । परन्तु अब उसके निर्जीव शरीर ने चलने से बिलकुल इन्कार कर दिया । खेत के किनारे वह लड़खड़ाकर गिर गया । अब प्राण नहीं बच सकते उसने सोचा । इतने में मशीन के एक इंजीनियर ने उसे गिरते हुए देख लिया । उसने दौड़कर एक डिब्बा पानी उठाया और रजत के पास वह भाग कर आया । उसके पीछे बाकी कुछ और लोग दौड़ते हुए आये । रजत में बोलने की भी क्षमता नहीं थी फिर भी उसने किसी तरह पुछा, “आप लोग इस मशीन को यहाँ किस लिए लाये हैं ?”

“हम लोग सरकारी योजना के तहत यहाँ आये हुए हैं जिसका उद्देश्य शुद्ध पेय जल की आपूर्ति है तथा देश के नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाना है,” उस इंजीनियर ने रजत के मुँह में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते हुए जवाब दिया ।

“आप लोग ईश्वर के अवतार हैं।“ इतना कहते हुए रजत का सिर लुढ़क गया और मुँह का पानी बाहर बह गया ।

                                                                                                                             गुरुवार, 13 अक्तूबर 2022

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