लिंग, वर्ण और नस्ल भेद
जब एससी/एसटी छात्रों को पढ़ाने जैसे पवित्र कार्य में भी बिजली के तार को पकड़ने जैसा खतरा है तब तो उनसे हर तरह दूर रहने में ही भलाई है। क्या कानून है भाई साहब! उन्हें पता नहीं कब फाइब स्टार होटल का चस्का लग जाय और सामने आप दिख जाओ - बस एक एफआईआर और उनका शौक़ तो पूरा जबकि आपकी चलती-फिरती जिंदगी गई। यदि यही रहा तो लोग दलितों के साथ क्यों रहना चाहेंगे, उनकी बस्तियों से अलग घर बनाएंगे। अब क्या सरकार उन्हें पुनः अछूत नहीं बना रही है? गनीमत तो इस बात की है कि सिस्टम में अभी भी बड़ी संख्या में सामान्य लोग हैं अन्यथा यह देश उनके लिए नर्क बन चुका होता और पलायन ही एक मात्र विकल्प बचता। हिन्दू, मुसलमान की बस्तियां तो पहले से ही अलग-अलग होती हैं। अब एक तीसरी कालोनी अलग होने वाली है। ये तीसरी कालोनी नहीं - देश के तीन भागों में बंटने का संकेत है। कोई एक पार्टी घृणा की राजनीति करती हो तो कुछ सोचा जाय किन्तु जब सारी पार्टियां वही कर रही हैं तो भगवान् ही मालिक है। यहाँ कानून न्याय या जन सुबिधा के लिए नहीं बनते बल्कि वोट के लिए बनते हैं। पूरा देश वर्ग संघर्ष की स्थिति में है। तुष्टिकरण की होड़ सी लगी है। सभी दलित या मुस्लिम को ही खुश करने में लगे हैं जैसे दूसरे वर्ग के लोग देश के नागरिक हैं ही नहीं। न हिन्दू, न मुसलमान जिस वर्ग के लोगों पर सरकार का वरदहस्त हो वही अत्याचारी बन जाता है। सत्ता में जब कांग्रेस होती है तब मुस्लिम अत्याचार करने लगता है और अब बीजेपी हुई तो दलित भस्मासुर बन गया - जिसके सर पर हाथ रख दे वही भस्म। उसकी नौकरी चली जाएगी, वह जेल चला जायेगा और उसका परिवार सड़क पर आ जायेगा। अन्य देशों में लिंग, वर्ण और नस्ल भेद घोर अपराध हैं क्योंकि इससे हिंसा और मानसिक पीड़ा उत्पन्न होती है। हमारे यहां ये भेद सरकार करवा रही है। वाह रे प्रधान सेवक ! आपकी सेवा से देश भर मेवा खा रहा है। अब मौका मिला है और मौका भी उन्होंने दिया है जो पानी भरने नहीं देते थे। भाई उन्हें देश से बाहर कर दो, जितनी जल्दी हो सके। भारत मां, तू देशी अंग्रेजों के हाथों में अभी भी परतंत्र है !
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