मुस्लिम और आरक्षित वर्ग
देश जबसे आजाद हुआ तबसे पूरे कांग्रेस काल तक मुस्लिम की आर्थिक और सामाजिक स्थिति उतनी ही ख़राब थी जितनी कि आरक्षित वर्ग की थी। दोनों वर्ग मजदूर हुआ करते थे। मुसलिम ने कभी मांग नहीं किया कि उसे कोई आरक्षण चाहिए। उसने छोटे-छोटे उद्योग और छोटी-छोटी कारीगरी को अपना व्यसाय बनाया और अपनी मेहनत और पुरुषार्थ पर भरोसा करके जुट गया। मोदी सरकार ने उद्योग को ऋण इत्यादि से प्रोत्साहित किया और विजली एवं सडकों की व्यवस्था ठीक की इसका लाभ उठाकर मुस्लिम समाज एकदम बूस्ट कर गया। आज हिन्दू वैश्यों से व्यापारिक प्रतियोगिता कर रहा है। पैसा होने की वजह से अच्छे-अच्छे लोग उन्हें सलाम ठोकने लगे हैं। इधर क्या हुआ समाज के उत्थान हेतु खैरात चाहिए। हमें आरक्षण की भीख दे दो हम दबे कुचले हैं। चलो भाई आरक्षण दे दिया गया और हुआ क्या जो पहले से पढ़े-लिखे सक्षम थे, जिनकी सामाजिक स्थिति पहले से सवर्णों जैसी थी उन्होंने लपक लिया और ऐसा शील कर दिया कि उसकी कोई बूँद नीचे टपक ही न सकी। दलित अभी भी दलित है। वह अपने मजदूर साथी मुस्लिम के यहां मजदूर बन गया। जब तक स्वयं से उठने की इच्छा नहीं करोगे कोई तुम्हें उठाने के लिए खाली नहीं है। बैठा बैल यदि खुद उठना न चाहे तो उसे कोई उठा नहीं सका है। कमजोर का सभी शोषण करते हैं। एक देशी कहावत है : "निबरेक जोइया सबकी सरहज" अर्थात जो कमजोर है उसकी पत्नी सभी की सरहज (साले की पत्नी) लगती है। तुम यदि कमजोर न होते तो आज राजनीतिक पार्टिया भी उसका लाभ उठाकर सस्ती राजनीती में सफल न होतीं।
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