मजदूर को 500 रु और बाबू को 5000 रु रोज
एक मजदूर को 500 रुपया रोज और एक बाबू को 5000 रुपया रोज : इसके अतिरिक्त मजदूर का पसीना गार लिया जाता है और बाबू ऐसी रूम में गप्पें छानकर दिन बिताता है और थोड़ा बहुत जो काम करता है उसके लिए घूस लेता है। आरक्षण की मारामारी सिर्फ इसी वजह से है न कि दलित उत्थान के लिए। बहुत से देशों में उच्चतम प्रतिभा को छोड़कर, शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम की मजदूरी लगभग सामान होती है, इसलिए वहां सभी काम सम्मानजनक माने जाते है। सामान्य जीवन यापन के लिए मजदूर को कम से कम 1500 रुपये रोज मिलना चाहिए और एक बाबू को 2000 रुपयों से अधिक नहीं मिलना चाहिए। सांसद एवं बिधायकों को भी इसी अनुपात में अपने बेतन कम करने चाहिए। यदि ऐसा हो जाय तो आरक्षण की जरूरत नहीं होगी और नागरिकों को उनके कौशल के अनुसार काम भी मिल सकेगा। जिस देश में प्रतिभा की कदर है वहां शक्ति और सम्पन्नता है और जब देश संपन्न होता है तो उसका प्रभाव सारे समाज पर पड़ता है। चीन इसका जीता जागता उदहारण है। छोटे बड़े हर औजार का अपना महत्त्व है। केवल बड़े औजार से ही नाव नहीं बनती। हमारे देश में आरी से ठोंका जाता है और हथौड़े से चीरा जाता है। जो बौद्धिक काम अच्छे से कर सकता है उसे शारीरिक काम के लिए विवश किया जा रहा है। सक्षम सवर्ण के बच्चे बड़ी संख्या में विदेशों में पढ़ते रहे हैं क्योंकि भारत में उनको सीटें नहीं मिलीं। वे पढ़-लिख कर उधर ही सेटिल हो जाते हैं और अपने टैलेंट का पूरा लाभ उस देश को देते रहे हैं। आज किसी भी देश का विकास उसकी बौद्धिक संपत्ति पर आधारित है जिसकी भारत में कोई कीमत नहीं है। जब जूनियर स्कूल का छात्र था तब मैं संस्कृति में बहुत कमजोर था, इसलिए पैसा देकर या चाट खिला कर दूसरे बच्चों से अपनी कॉपी लिखाया करता था। एक दिन पंडित जी ने कहा अपनी कॉपी दिखाओ। मैंने अपनी कॉपी पेश कर दिया क्योंकि बिलकुल अपडेट थी। पंडित जी ने बड़ी बारीकी से एक-एक पन्ने को अवलोकन किया और जोर से बुलाया महरा इधर आओ। मेरे पैर काँप गए, धरती घूमने लगी क्योंकि क्लास में डंडे के लिए पंडित जी चपरासी बुलाते थे। उस दिन महरा बहुत खुश हुआ क्योंकि कोई अध्यापक मुझे मारता नहीं था। वह रूसा के लम्बे-लम्बे पतले-पतले दस डंडे तोड़कर लाया। एक ही कॉपी में बीस लोगों की लिखावट होने की वजह से पंडित जी ने मेरी ऐसी बढ़िया सेवा की कि मुझे सब भूल सकता है वह दिन नहीं। आज भारत की यही स्थिति है। जिस देश से वह माल ख़रीदता हैं उससे यही कहता है हमें साथ-साथ टेक्नोलॉजी भी चाहिए क्योंकि उल्टी नीति की वजह से देश टेक्नोलॉजी में कमजोर है। वैज्ञानिकों के आभाव में सरकार ने इसरो जैसी बड़ी-बड़ी संस्थाओं को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल दिया है। जब सब कुछ प्राइवेट हो रहा है तो आरक्षण अब एक ढोंग नहीं तो क्या है और इस ढोंग ने बेवजह घृणा फैलाकर समाज को विषाक्त कर दिया है। मेरे एक मित्र ने कहा कि सवर्ण मुख्य रूप से ब्राह्मण अपनी बौद्धिक क्षमता का झूठा डींग मारता है तो मैंने कहा कि जिस नोबेल प्राइज़ को ट्रम्प तरसते हैं उसको 9 भारतीयों ने प्राप्त किया है जिसमें एक कायस्थ, एक वैश्य और सात ब्राह्मण हैं और भारत में जितने भी बड़े आविष्कार हुए हैं उसे सवर्णों ने ही किये हैं।
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