आरक्षित अनारक्षित में विषैला भेदभाव

बीजेपी सरकार ने यूजीसी अधिनियम के माध्यम से आरक्षित और अनारक्षित के बीच में विषैला भेदभाव पैदा कर दिया है जो मिटेगा नहीं। ऐसा अचानक क्यों किया है इसे स्पष्ट रूप से कोई नहीं जानता। कोई कहता है पीडीए कांसेप्ट को निष्प्रभावी करके पिछड़े और दलित को आकर्षित करना है, तो कोई कहता है कि मुख्यमंत्री योगी जी की तेजी से बढती लोकप्रियता को समाप्त करना है। जो भी हो, ऐसी राजनीति देश के लिए अत्यंत अशुभ है। ओबीसी और सामान्य में शून्य भेदभाव था, हिन्दू के नाम पर दोनों को इकठ्ठा करना सरल था और इसी आधार पर बीजेपी का संगठन खड़ा हुआ। मण्डल आयोग ने दोनों को बाँट दिया और तबसे जहां सवर्ण प्रत्यासी होते हैं वहां बड़ी संख्या में ओबीसी वोट कट जाते हैं। किन्तु अब जो हुआ है उसने तो दोनों वर्गों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। परिणाम यह होगा कि जहां ओबीसी प्रत्याशी होगा वहां सवर्ण नोटा ठोंकेगा और जहां सवर्ण प्रत्यासी होगा वहा ओबीसी अपने प्रत्यासी की ओर झुकेगा, वह भले किसी पार्टी का हो। बीजेपी के अमृत काल में काल पैदा हो गया है। आने वाले समय में सवर्ण अपनी अलग राजनीति के विकल्प को तलाशेगा, अपनी बस्तियां मुस्लिम से ही नहीं आरक्षित वर्ग से भी अलग बनाना चाहेगा, अपने बच्चों के लिए अलग शिक्षा संस्थान खोलेगा और धीरे-धीरे अपने अलग राष्ट्र का रास्ता निकालेगा। सरदार बल्ल्भभाई पटेल ने रियासतों को जोड़ा था, अबके गुजराती फिर से ज्यों का त्यों कर रहे हैं।

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