समय लग सकता है पर क्या रावण बच सकता है

 



जब सत्ताधारियों का ह्रदय भी जातिवाद का भवन बन जाय तो जनता के ह्रदय से राष्ट्रवाद पलायन करने लगता है। सत्ता की उष्मा बहुत मादक होती है - लम्बे समय तक कम ही लोग होश में रह पाते हैं। अधिकतर प्रतिशोध-राजनीति से सीना ठंढा करने लगते हैं। वे रोगाणुओं को मारते-मारते अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट करने पर उतर आते हैं। अंततः ऐसे मतवाले हाथी दलदल में फंसकर असहाय हो जाते हैं। सत्ता का अहम् आर्थिक पतन, जनक्रांति, तख्तापलट, विदेशी हस्तक्षेप को जन्म देता है। मुसोलिनी, अडॉल्फ हिटलर, सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी, मादुरो इसके कुछ उदहारण हैं। पकिस्तान में राजनितिक अस्थिरता का कारण प्रतिशोध राजनीति है। स्थाई और संतुलित राजनीति धैर्य मांगती है, होश मांगती है, अकड़ नहीं लोच मांगती है। जातिवाद से जले बिहार में जहां-तहाँ राख है। यूपी इत्यादि को भी होना क्या ख़ाक है? सत्ता को चाहिए वह एन्टीबायटिक औषधि का काम करे, साइड इफेक्ट न बने। वणिक की तरह वही कौड़ी खर्च करे जो नयी कौड़ियां ला सकती हैं न कि हर कौड़ी को तितर-बितर कर दे। गाय और ब्राह्मण हिंसक नहीं होते, उनसे हिंसा त्रिभुवन स्वामी राजा राम को चुनौती है। समय लग सकता है पर क्या रावण बच सकता है? अब ब्राह्मणों को चाहिए पार्टी को नहीं अपने जाति के प्रत्याशियों को वोट करे। 


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