व्यक्तिगत विवाद

 



एक समय था जब लोग बड़े सम्मान से कहते थे "ठाकुर साहब" "पण्डित जी"। आज दोनों उपाधियाँ जैसे गाली बन गई हों। अंग्रेज बूट की ठोकर लगा कर कहते थे "इंडियन डॉग", मुग़ल तिरस्कार से कहते थे "काफिर"। किन्तु ये तो मालिक थे इनके द्वारा किये गए अपमान को भूल जाना चाहिए। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के लिए प्रचार करना पड़ता है "मैं पिछड़ा हूँ, मैं दलित हूँ"। जब आप अपने को पिछड़ा या दलित कहने में गर्व करते हो तो समरसता के लिए कम से कम हमें भी साहब या जी को हटाकर ही कहने दो मैं ठाकुर हूँ या पंडित हूँ। सामने वाला कहता है, "कौन सी जाति की हो ? गर्मी दूर कर दूंगा !" इसमें घोर अहंकार है ! फिर भी इस अहंकार को बुरा नहीं माना जाएगा ! अहंकार तो तब हुआ जब आस्था सिंह ने जवाब में अपना जाति बता दिया। 6 जनवरी की घटना 6 फरवरी के बाद वाइरल की जा रही है। दो सामान जातियों के लोगों ने गुस्से में एक दूसरे को गर्मी दिखाई और बिना किसी को नुक्सान किये शांत हो गए। इसका उद्देश्य निश्चित राजनीतिक है जिसके माध्यम से यह प्रचार करना है कि ठाकुर में अहंकार है । जबकि राजनीति होनी चाहिए कि या तो जातियां हटें या सभी जातियों को समान सम्मान मिले क्योंकि प्रधानमन्त्री तनखिया नौकर है और झाड़ू लगाने वाला भी नौकर है। मेरी मांग है कि कार्य कोई भी हो मजदूरी सामान होनी चाहिए क्योंकि चाहे मानसिक हो या शारीरिक सभी कार्य में सामान मेहनत लगता है।
व्यक्तिगत विवाद बाप-बेटे में हो सकता है, ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय, हिन्दू-हिन्दू, मुस्लिम-मुस्लिम में हो सकता है। जाति-पात, धर्म, नस्ल आदि की भूमिका सामूहिक विवाद में होती है। सामूहिक विवाद व्यक्तिगत विवाद को समाप्त करके अलग-अलग दोनों वर्गों को संगठित कर देता है। वहीँ कई बार व्यक्तिगत विवाद सामूहिक विवाद का कारण बन जाता है। जो भी हो, हिन्दू समाज में आपसी दुश्मनी सत्ता पर देशी पकड़ को ढीली करती है, इसलिए व्यक्तिगत विवादों को मिडिया पर प्रतिबंध होना चाहिए और लोगों को फेक आईडी में दुश्मनों को भांपना चाहिए। जातीय भेद से पार्टियों का संगठन भी प्रभावित होने लगा है - यूजीसी उसी का परिणाम है। सानान्य और आरक्षित वर्गों के बीच की खाई तो मिट सकती है किन्तु सामान्य के भीतर की दरारें अमिट हैं। स्थिति विगड़ रही है. ईर्ष्या, अहंकार, और अति महत्वाकांक्षा देशी सत्ता को खाने लगी हैं।

यूजीसी 2026 कानून नहीं बल्कि करोना 2026 है जो समाज ही नहीं घर-घर में वैमनस्य फैला रहा है। इसकी वजह से चारों ओर अनिश्चितता का माहौल बनता जा रहा है। अपनी ही सरकार लगता है अपनी दुश्मन है। एससी/एसटी अधिनियम संशोधन 2018 को सोचकर सभी असमंजस में हैं कि कोर्ट कुछ करे और कहीं सरकार कुछ और न कर दे। कानूनविदों की एक टीम इसे बढ़िया व्याहारिक एवं कल्याणकारी कानून में तब्दील सकती है। मैं समझ रहा हूँ इसमें क्या परेशानी है? विश्व बंधुत्व की बात तो छोडो, हमारी डिक्शनरी से बंधुत्व शब्द ही मिट रहा है। "ॐ सह नौ-अवतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्य्यं करवावहै। तेजस्वी नौ-अधितम-अस्तु माँ विद्विस्सावहै। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।" इस मन्त्र से भारतीयों का अधिकार ख़तम हो रहा है। ऐसा तो नहीं है घायल किंग आर्थर अपने सेनापति बीडीवर से कह रहा हो कि मेरी दैविक तलवार एक्सकैलिबर को अब उसी झील में फेंक दो जहां की वह थी :

"The old order changeth, yielding place to new,

And God fulfils Himself in many ways,

Lest one good custom should corrupt the world.

Comfort thyself: what comfort is in me?

I have lived my life, and that which I have done

May He within Himself make pure! but thou,

If thou shouldst never see my face again,


Morte d'Arthur

BY ALFRED, LORD TENNYSON


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