ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं शूद्र
हमारा प्राचीन ग्रन्थ स्कन्द पुराण कहता है: "जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् भवेत् द्विजः। वेद पाठात् भवेत् विप्रः, ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मण।" जन्म के समय सभी शूद्र होते हैं। अच्छे संस्कार प्राप्त करने पर उन्हें द्विज की पदवी मिलती है। उसके बाद वेद ज्ञान अर्जित करने पर विप्र सम्मान मिलता है। अंत में ब्रह्म बोध के बाद ही वे ब्राह्मण कहलाने योग्य हो सकते हैं। प्राकृतिक रूप से सबकी प्रवृति एक सी तो हो नहीं सकती। उन्हीं किशोरों में कुछ को युद्ध विद्या पसन्द आयी तो क्षत्रिय की उपाधि मिली जिसका अर्थ है सुरक्षा क्षत्र। कुछ किशोरों ने मानसिक अथवा शारीरिक विकास में रूचि नहीं लिया तो वे शूद्र ही रह गये। किन्तु उन्होंने खेती, कौशल और पशुपालन में अच्छी रूचि दिखाई, प्रशंसनीय कार्य किये। बच्चा शूद्र होता है तो क्या वह प्यारा नहीं होता ? शूद्र प्रिय एवं मंगलकारी शब्द है घृणा का शब्द नहीं। शूद्र में शू का का अर्थ है त्वरित और द्र का गतिमान होना। इसीलिए बच्चा चंचल होता है। यह शब्द किसान एवं कुशल शिल्पकार के लिए है जिसका सम्बन्ध अन्नदात इंद्र और भगवान् विश्वकर्मा से है। समय के साथ सभ्यता का विकास हुआ बाज़ार अस्तित्व में आ गया तो इन्हीं में से एक और वर्ग वैश्य की उतपत्ति हुई। पहले अपनी अपनी सफाई का कार्य सभी स्वयं करते थे बाद में अकुशल लोगों का यह व्यवसाय बन गया। कालान्तर में जो जिस व्यवसाय में था उनकी पीढ़ियों में वहीँ डीएनए बनता गया और वर्ग ने जाति का रूप ले लिया। यहीं समाज को खंडित होने की संभावना बनी जिसका दुरपयोग मुग़लों, अंग्रेजों और भारतीय कांग्रेस ने खूब किया।
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